Transliteration: (Minal mu'mineena rijaalun sadaqoo maa 'aahadul laaha 'alaihi faminhum man qadaa nahbahoo wa minhum mai yantaziru wa maa baddaloo tabdeelaa)
"मोमिनों में से कुछ ऐसे मर्द हैं जिन्होंने उस अहद को सच कर दिखाया [55] जो उन्होंने अल्लाह से किया था। पस उनमें से किसी ने अपनी मन्नत पूरी कर दी [56], और उनमें से कोई (शहादत का) इंतज़ार कर रहा है [57], और उन्होंने (अपने अहद में) ज़रा भी तब्दीली नहीं की [58]।"
इससे मुराद हज़रत उस्माने ग़नी, तलहा, सईद इब्ने हमज़ा, और हज़रत मुसअब इब्ने उमैर (रज़ियल्लाहु अन्हुम) जैसे जलीलुल क़द्र सहाबा-ए-किराम हैं। उन्होंने अहद किया था कि अगर उन्हें जिहाद में शिरकत का मौक़ा मिला, तो वे साबित-क़दम रहेंगे। जब इम्तिहान का वक़्त आया, तो उन्होंने अपने वादे को हूबहू सच कर दिखाया। यह आयत ताकीद फ़रमाती है कि उनके नेक आमाल बारगाह-ए-इलाही में मक़बूल हुए और अल्लाह तआला ने उनकी साबित-क़दमी की तस्दीक़ फ़रमाई।
ये वे सहाबा-ए-किराम हैं जिन्होंने मैदान-ए-जंग में साबित-क़दमी के साथ लड़ते हुए शहादत का अज़ीम दर्जा पाया, जैसे कि हज़रत सय्यिदुश-शुहदा हमज़ा और हज़रत मुसअब इब्ने उमैर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा)।
कुछ सहाबा-ए-किराम ऐसे थे जिन्हें उस वक़्त तक शहादत नसीब न हुई थी मगर वे बड़ी बेचैनी और शौक़ से इसके मुंतज़िर थे, बिल्कुल उसी तरह जैसे कोई दूल्हा अपनी शादी के दिन का बड़ी उम्मीद और आरज़ू के साथ इंतज़ार करता है।
यह आयत उन बातिल ख़यालात का पुरज़ोर रद्द फ़रमाती है जो यह दावा करते हैं कि सहाबा-ए-किराम हुज़ूर ﷺ के पर्दा फ़रमाने के बाद फिर गए थे; हक़ीक़त यह है कि वे कभी अपने दीन से ज़रा भी नहीं डिगे। मिसाल के तौर पर हज़रत अनस इब्ने नज़र (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने जब जंगे उहुद में हुज़ूर ﷺ की शहादत की झूठी अफ़वाह सुनी, तो फ़रमाया कि हुज़ूर के बाद ज़िंदा रहकर क्या करेंगे और बे-जिगरी से लड़ते हुए दर्जनों ज़ख़्म खाकर शहीद हो गए, जो अटूट ईमान की बे-मिसाल नज़ीर है।
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