Transliteration: (Li yajziyal aahus saadiqeena bisidqihim wa yu'azzibal munaafiqeena in shaaa'a aw yatooba 'alaihim; innal laaha kaana Ghafoorar Raheemaa)
"ताकि अल्लाह सच्चों को [59] उनकी सच्चाई का बदला दे, और मुनाफ़िक़ों को चाहे तो अज़ाब दे या उनकी तौबा क़बूल फ़रमाए। बेशक अल्लाह बहुत बख़्शने वाला, निहायत रहम फ़रमाने वाला है [60]।"
अल्लाह तआला सच्चे मोमिनों को जो बदला अता फ़रमाता है वह इस दुनिया में भी नुमायां है। उनके जाने के बाद भी सालहा-साल तक अहले ईमान उनके ज़िक्र और याद को इज़्ज़त व एहतिराम के साथ ज़िंदा रखते हैं। बातिल ताक़तों की तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी याद को मिटाया नहीं जा सका, जो उनके इख़्लास और साबित-क़दमी का रौशन सुबूत है।
यह आयत इशारा फ़रमाती है कि कुछ मुनाफ़िक़ तौबा करके अल्लाह की रहमत से हिदायत पा जाएंगे, जबकि दूसरे अपने निफ़ाक़ पर अड़े रहेंगे और दुनिया में ज़िल्लत व आख़िरत में अज़ाब के मुस्तहिक़ होंगे। अल्लाह की सिफ़ात गफ़ूर व रहीम यह दर्शाती हैं कि जो कोई भी सच्चे दिल से उसकी तरफ़ रुजूअ करेगा, उसके लिए मग़फ़िरत का दरवाज़ा हमेशा खुला है।
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