Transliteration: (Yaaa aiyuhan Nabiyyu qul li azwaajika in kuntunna turidnal hayaatad dunyaa wa zeenatahaa fata'aalaina umatti'kunna wa usarrihkunna saraahan jameela)
"ऐ नबी (ग़ैब की ख़बरें देने वाले)! अपनी बीवियों से फ़रमा दीजिए [68]: 'अगर तुम दुनियावी ज़िंदगी और उसकी ज़ीनत [69] (ठाठ-बाट) चाहती हो, तो आओ मैं तुम्हें कुछ माल [70] दे दूँ और हुस्ने सुलूक के साथ रुख़्सत [71] (तलाक़) कर दूँ;'"
हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की अज़वाज-ए-मुतह्हरात ने एक मर्तबा दुनियावी आराम और घरेलू ख़र्च (नफ़क़े) में इज़ाफ़े की दरख़्वास्त की, जो हुज़ूर ﷺ पर गिरां गुज़री क्योंकि आपके मुक़द्दस हुजरे क़नाअत और ज़ुहद के लिए मशहूर थे। इस पर यह आयत नाज़िल हुई जिसमें आपकी मुकद्दस बीवियों को दुनियावी ख़्वाहिशात के मुक़ाबले में इख़्तियार दिया गया।
उस वक़्त हुज़ूर ﷺ के निकाह में नौ अज़वाज-ए-मुतह्हरात थीं:
पाँच क़ुरैशी ख़ानदान से: हज़रत आइशा, हज़रत हफ़सा, उम्मे हबीबा बिन्ते अबू सुफ़ियान, उम्मे सलमा बिन्ते अबू उमय्या, और सौदा बिन्ते ज़मआ (रज़ियल्लाहु अन्हुन्न)।
चार ग़ैर-क़ुरैशी: ज़ैनब बिन्ते जहश, मैमूना बिन्ते हारिस, सफ़िय्या बिन्ते हुयै, और जुवैरिया बिन्ते हारिस (रज़ियल्लाहु अन्हुन्न अजमईन)।
अगर वे दुनियावी ज़िंदगी के आराम और ज़ीनत की ख़्वाहिशमंद हैं, तो वे रुख़्सत होने का रास्ता चुन सकती हैं। लेकिन अगर वे अल्लाह तआला और उसके महबूब रसूल ﷺ की क़ुर्बत चाहती हैं, तो उन्हें नबवी घराने की सादगी और फ़ाक़ा-मस्ती पर सब्र करना होगा।
यहाँ से दो अहम शरई मसाइल मालूम होते हैं:
बीवी को तलाक़ का इख़्तियार दिया जा सकता है; जब तक वह ख़ुद इसे इख़्तियार न करे तलाक़ वाक़े नहीं होती।
अगर सोहबत के बाद तलाक़ दी जाए, तो उसे कुछ कपड़े और साज़ो-सामान देना मुस्तहब है; और अगर सोहबत से पहले हो और महर मुक़र्रर न हुआ हो, तो कम अज़ कम एक जोड़ा कपड़ा देना वाजिब है।
वे अज़वाज जिन्हें हुज़ूर ﷺ ने रुख़सती (सोहबत) से पहले तलाक़ दी थी वे बाद में दूसरा निकाह कर सकती थीं, जैसे कि उमैमा जुवैनीय्या। लेकिन जिन्होंने हुज़ूर ﷺ के साथ सोहबत की सआदत पाई, उन्होंने आपके विसाल के बाद कभी दूसरा निकाह नहीं फ़रमाया।
वे अगरचे तलाक़ का मुतालबा कर सकती थीं, मगर एक ख़ास हुक्म की वजह से हक़ीक़त में निकाह में ही रहतीं:
"और न यह हलाल है कि तुम उनके बाद उनकी बीवियों से निकाह करो" (सूरह अल-अहज़ाब: 53)।
यह हुक्म दूसरों के लिए हुज़ूर ﷺ की अज़वाज से निकाह को हमेशा के लिए हराम ठहराता है, जिससे वे सिर्फ़ क़ानूनी नहीं बल्कि अज़मत व एहतिराम के लिहाज़ से तमाम अहले ईमान की "उम्महातुल मुअमिनीन" (मोमिनों की माँएं) हैं।
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