Transliteration: (Yawma tuqallabu wujoohuhum fin Naari yaqooloona yaa laitanaaa ata'nal laaha wa ata'nar Rasoolaa)
"जिस दिन उनके चेहरे आग में उलटे-पुलटे जाएंगे, वे कहेंगे: 'हाय काश! हमने अल्लाह की फ़रमांबरदारी की होती और रसूल का हुक्म माना होता [189]!'"
इस आयत-ए-करीमा से दो बुनियादी हक़ीक़तें सामने आती हैं:
तमाम कुफ़्फ़ार आख़िरत में शदीद हसरत और रुसवाई में मुब्तला होंगे। उनकी यह हसरत और नदामत उस वक़्त ज़ाहिर होगी जब वे जहन्नम की आग में झोंक दिए जाएंगे, जब अपनी क़िस्मत बदलने का वक़्त गुज़र चुका होगा।
उनकी यह शर्मिंदगी कोई नफ़ा न दे सकेगी, क्योंकि तौबा की मुहलत सिर्फ़ इसी दुनिया में है। जिस तरह बे-मौसम का बीज कोई फल नहीं देता, उसी तरह मौत और अज़ाब के बाद की तौबा कोई सवाब या नजात नहीं दिला सकती।
यह आयत वाज़ेह पैग़ाम देती है कि अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की इताअत क़यामत आने से पहले लाज़िम है, क्योंकि जब अज़ाब शुरू हो जाएगा तो हसरत और रोना-धोना बिल्कुल बे-असर साबित होगा।
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