कुरान - 33:67 सूरह अल-अहज़ाब अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

67
وَقَالُواْ رَبَّنَآ إِنَّآ أَطَعۡنَا سَادَتَنَا وَكُبَرَآءَنَا فَأَضَلُّونَا ٱلسَّبِيلَا۠

Transliteration: (Wa qaaloo Rabbanaaa innaaa ata'naa saadatanaa wa kubaraaa'anaa fa adalloonas sabeelaa)

और वे कहेंगे: "ऐ हमारे रब! हमने अपने सरदारों और अपने बड़ों का हुक्म माना था [190], तो उन्होंने हमें सीधे रास्ते से भटका दिया।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहज़ाब आयत 67 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहज़ाब तफ़सीर - आयत 67

"और वे कहेंगे: 'ऐ हमारे रब! हमने अपने सरदारों और अपने बड़ों का हुक्म माना था [190], तो उन्होंने हमें सीधे रास्ते से भटका दिया।'"

[190] ग़लत पैरवी और दूसरों पर इल्ज़ाम तराशी

क़यामत के दिन काफ़िर अपनी गुमराही का इल्ज़ाम अपने पेशवाओं और सरदारों पर डालने की कोशिश करेंगे, यह कहते हुए कि उन्होंने सिर्फ़ अपने क़ौमी रहनुमाओं और बड़ों की पैरवी की थी जिन्होंने उन्हें हक़ से फेर दिया था।

उनकी इस फ़रियाद का मक़सद यह होगा: “हमें अज़ाब न दे बल्कि उन्हें अज़ाब दे जिन्होंने हमें भटकाया।” लेकिन यहाँ सरदारों से मुराद कुफ़्र व गुमराही के लीडर हैं, इस्लाम के औलिया-ए-किराम या हक़्क़ानी उलमा नहीं।

इस आयत को नेक बुजुर्गों और उलमा पर चस्पां करना सख़्त फ़रेब और बेदीनी है। यह आयत सिखाती है कि दुनियावी सरदारों की अंधी पैरवी, बिना हक़ व बातिल की तमीज़ के, हलाकत की तरफ़ ले जाती है—और हर शख़्स अपने फ़ैसलों का ख़ुद ज़िम्मेदार है।

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