Transliteration: (Wa law shaaa'al laahu maaa ashrakoo; wa maa ja'alnaaka 'alaihim hafeezanw wa maaa anta 'alaihim biwakeel)
यह सिखाता है कि काफ़िरों का कुफ़्र और शिर्क अल्लाह की मर्ज़ी (इरादा) से होता है, उसकी पसंद (चाहत) से नहीं। मर्ज़ी का मतलब है किसी चीज़ का वक़ूअ होने देना, जबकि चाहत का मतलब है भलाई का हुक्म देना। ये दोनों अलग-अलग हैं।
नबी ﷺ उनके कुफ़्र के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। आपको न तो उनका निगरान बनाया गया है और न ही उनका वकील। आपका काम सिर्फ़ पैग़ाम पहुंचाना है, मजबूर करना नहीं।
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