कुरान - 6:107 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

107
وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ مَآ أَشۡرَكُواْۗ وَمَا جَعَلۡنَٰكَ عَلَيۡهِمۡ حَفِيظٗاۖ وَمَآ أَنتَ عَلَيۡهِم بِوَكِيلٖ

Transliteration: (Wa law shaaa'al laahu maaa ashrakoo; wa maa ja'alnaaka 'alaihim hafeezanw wa maaa anta 'alaihim biwakeel)

और अगर अल्लाह चाहता तो वे शिर्क न करते [232]। और हमने तुम्हें उन पर निगहबान नहीं बनाया, और न ही तुम उनके वकील हो [233]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 107 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 107 की तफ़्सीर

✅ [232] इलाही मर्ज़ी और इलाही चाहत में फ़र्क़

यह सिखाता है कि काफ़िरों का कुफ़्र और शिर्क अल्लाह की मर्ज़ी (इरादा) से होता है, उसकी पसंद (चाहत) से नहीं। मर्ज़ी का मतलब है किसी चीज़ का वक़ूअ होने देना, जबकि चाहत का मतलब है भलाई का हुक्म देना। ये दोनों अलग-अलग हैं।

✅ [233] नबी ﷺ उनके ईमान के ज़िम्मेदार नहीं

नबी ﷺ उनके कुफ़्र के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। आपको न तो उनका निगरान बनाया गया है और न ही उनका वकील। आपका काम सिर्फ़ पैग़ाम पहुंचाना है, मजबूर करना नहीं।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now