कुरान - 6:106 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

106
ٱتَّبِعۡ مَآ أُوحِيَ إِلَيۡكَ مِن رَّبِّكَۖ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَۖ وَأَعۡرِضۡ عَنِ ٱلۡمُشۡرِكِينَ

Transliteration: (ittabi' maaa oohiya ilaika mir Rabbika laaa ilaaha illaa Huwa wa a'rid 'anil mushrikeen)

जो तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारी तरफ़ वही की गई है [230] उसका पैरवी करो। उसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, और मशरिक़ीन से मुँह मोड़ लो [231]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 106 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 106 की तफ़्सीर

✅ [230] वही में क़ुरआन और हदीस दोनों शामिल हैं

यह हुक्म हर तरह की इलाही वही के लिए है — चाहे वह क़ुरआन की साफ़ और महफ़ूज़ आयतें हों या हदीस शरीफ़ के ज़रिए पहुँची हुई इल्हामी बातें। दोनों ही वही हैं, और दोनों की पैरोई लाज़िमी है। इस आयत से हदीस को इलाही रहनुमाई से अलग करने का दावा साबित नहीं होता, बल्कि यह दोनों के एक ही दर्जे के हुक्म होने को बयान करती है।

✅ [231] मशरिक़ीन से मुअामला – दो तफ़्सीरें

इस हिस्से में नबी ﷺ को मशरिक़ीन से मुँह मोड़ने का हुक्म दिया गया है। उलमा ने इसके दो मतलब बयान किए हैं:

  1. अस्थायी सब्र: शुरू में नबी ﷺ को हुक्म था कि मशरिक़ीन की बातों का रद्द करें लेकिन उनसे सख़्त टकराव न करें। बाद में जिहाद की आयतें नाज़िल होने पर यह हुक्म मंसूख़ होकर ज़रूरत पड़ने पर जंग का हुक्म आ गया।
  2. उनके अक़ीदे का इन्कार: यानी नबी ﷺ को उनकी ग़लत बातों से इग्नोर करने और उनके अक़ीदे को रद्द करने का हुक्म है, बिना लाज़िमी तौर पर जंग का मतलब निकाले। इस सूरत में यह हुक्म हमेशा के लिए क़ायम है।

दोनों तफ़्सीरें बताती हैं कि मुख़ालिफ़त से निपटने में इलाही हिकमत पहले सब्र और फिर ज़रूरत पर क़दम उठाने की है।

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