Transliteration: (ittabi' maaa oohiya ilaika mir Rabbika laaa ilaaha illaa Huwa wa a'rid 'anil mushrikeen)
यह हुक्म हर तरह की इलाही वही के लिए है — चाहे वह क़ुरआन की साफ़ और महफ़ूज़ आयतें हों या हदीस शरीफ़ के ज़रिए पहुँची हुई इल्हामी बातें। दोनों ही वही हैं, और दोनों की पैरोई लाज़िमी है। इस आयत से हदीस को इलाही रहनुमाई से अलग करने का दावा साबित नहीं होता, बल्कि यह दोनों के एक ही दर्जे के हुक्म होने को बयान करती है।
इस हिस्से में नबी ﷺ को मशरिक़ीन से मुँह मोड़ने का हुक्म दिया गया है। उलमा ने इसके दो मतलब बयान किए हैं:
दोनों तफ़्सीरें बताती हैं कि मुख़ालिफ़त से निपटने में इलाही हिकमत पहले सब्र और फिर ज़रूरत पर क़दम उठाने की है।
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