कुरान - 6:108 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

108
وَلَا تَسُبُّواْ ٱلَّذِينَ يَدۡعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ فَيَسُبُّواْ ٱللَّهَ عَدۡوَۢا بِغَيۡرِ عِلۡمٖۗ كَذَٰلِكَ زَيَّنَّا لِكُلِّ أُمَّةٍ عَمَلَهُمۡ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّهِم مَّرۡجِعُهُمۡ فَيُنَبِّئُهُم بِمَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ

Transliteration: (Wa laa tasubbul lazeena yad'oona min doonil laahi fa yasubbul laaha 'adwam bighairi 'ilm; kazaalika zaiyannaa likulli ummatin 'amalahum summa ilaa Rabbihim marji'uhum fa yunabbi'uhum bimaa kaanoo ya'maloon)

और जिनको वे अल्लाह के सिवा पुकारते हैं, उन्हें बुरा-भला मत कहो, कहीं वे दुश्मनी में, बिना इल्म के, अल्लाह को बुरा न कह बैठें [234]। इसी तरह हमने हर उम्मत के लिए उनके अमल को उनके नज़रों में सजाया है। फिर उनके रब की तरफ़ उनकी वापसी है, और वह उन्हें बता देगा जो वे किया करते थे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 108 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 108 की तफ़्सीर

✅ [234] उकसावे से बचने का हुक्म और उसका सन्दर्भ

मुसलमान काफ़िरों के बुतों के बारे में बुरा कहते थे, तो मशरिक़ीन ने बदले में अल्लाह की बेअदबी शुरू कर दी। तब यह आयत नाज़िल हुई, जिसमें मुसलमानों को हुक्म दिया गया कि बुत-परस्तों के सामने उनके माबूदों को बुरा न कहें। इब्न अन्हबरी के मुताबिक, बाद में जब मुसलमान काफ़ी मज़बूत हो गए और अल्लाह की बेअदबी पर सख़्ती से जवाब देने की ताक़त आ गई, तो यह हुक्म जिहाद की आयतों से मंसूख़ हो गया (जैसा कि ख़ज़िन और ख़ज़ाइनुल इर्फ़ान में है)।

फिर भी, क़ुरआन में कई जगह शैतान, बुतों और कुरैश के सरदारों की सख़्त तज़लील की गई है, जैसे — “बेशक तुम और वह जिसे तुम पूजते हो” (सूरा साफ़्फ़ात 37:161) और “बदतमीज़ और उसके पैदा होने में भी ऐब है” (सूरा क़लम 68:13)।

इस आयत से कुछ अहम मसाइल समझ में आते हैं:

  • अगर किसी इबादत या अमल से ऐसा बदले का रद्द-अमल पैदा हो जो क़ाबू में न आ सके, तो उसे छोड़ देना चाहिए।
  • तालीमात और ख़ुत्बे ऐसे न हों जो हिंसा या गाली-गलौज को भड़काएं।
  • अगर नेक-नीयत नसीहत से मामला बिगड़ने का अंदेशा हो, तो उसे रोक देना चाहिए।
  • ज़िद और दुश्मनी इंसान को पूरी तरह रूहानी तबाही की तरफ़ ले जा सकती है — जैसे मक्के के लोग अल्लाह को मानते थे, लेकिन नबी ﷺ से दुश्मनी के कारण उसकी बेअदबी करते थे।

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