Transliteration: (Qad jaaa'akum basaaa'iru mir Rabbikum faman absara falinafsihee wa man 'amiya fa'alaihaa; wa maaa ana 'alaikum bihafeez)
इससे मुराद हज़रत मुहम्मद ﷺ के मोज़िज़ात और क़ुरआन की आयतें हैं। दरअसल नबी ﷺ की ज़ात खुद अल्लाह के वजूद और उसके पैग़ाम की ज़िंदा निशानी है। जैसा कि अल्लाह ने फ़रमाया: बेशक तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से एक ख़ुली दलील आ चुकी है (सूरा अन-निसा 4:175)। ये दलीलें रहमत हैं, ताकि सोचने वाले हिदायत पा सकें।
क़ुरआन ने हिदायत को रोशनी और देखने से, और गुमराही को अंधापन से तश्बीह दी है। जो हक़ को क़ुबूल करता है, वह अपना फ़ायदा करता है, और जो इंकार करता है, वह अपना नुकसान करता है। नबी का काम सिर्फ़ पैग़ाम पहुंचाना है, ईमान थोपना नहीं। जैसे सूरज को न मानना उसकी रोशनी को कम नहीं करता, वैसे ही नबी ﷺ का इनकार उनकी रिसालत और मक़ाम को कम नहीं करता।
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