कुरान - 6:113 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

113
وَلِتَصۡغَىٰٓ إِلَيۡهِ أَفۡـِٔدَةُ ٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ بِٱلۡأٓخِرَةِ وَلِيَرۡضَوۡهُ وَلِيَقۡتَرِفُواْ مَا هُم مُّقۡتَرِفُونَ

Transliteration: (Wa litasghaaa ilaihi af'idatul lazeena laa yu'minoona bil Aakhirati wa liyardawhu wa liyaqtarifoo maa hum muqtarifoon)

ताकि जिनके दिल [245] आख़िरत पर ईमान नहीं रखते, वे उसकी तरफ़ झुक जाएं, और उससे राज़ी हो जाएं, और जो गुनाह उन्हें कमाना है, वह कमा लें [246]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 113 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 113 की तफ़्सीर

✅ [245] कमज़ोर ईमान का झुकाव

यह सिर्फ़ उन लोगों के बारे में है जिनका ईमान कमज़ोर होता है। ऐसे लोग अक्सर काफ़िरों की माँगों की तरफ़ झुक जाते हैं और उनके विचारों का समर्थन करने लगते हैं। इससे यह साबित होता है कि दिल अपने मिज़ाज और अकीदे से मिलते-जुलते लोगों की तरफ़ ही खिंचते हैं।

✅ [246] गुनाह का समर्थन भी गुनाह है

किसी गुनाह का समर्थन करना, ख़ुद एक गुनाह है। जैसे चोरी का माल छुपाना या बेचना, यह दोनों अमल अपने-आप में अपराध हैं और इनका अपना गुनाह है।

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