कुरान - 6:114 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

114
أَفَغَيۡرَ ٱللَّهِ أَبۡتَغِي حَكَمٗا وَهُوَ ٱلَّذِيٓ أَنزَلَ إِلَيۡكُمُ ٱلۡكِتَٰبَ مُفَصَّلٗاۚ وَٱلَّذِينَ ءَاتَيۡنَٰهُمُ ٱلۡكِتَٰبَ يَعۡلَمُونَ أَنَّهُۥ مُنَزَّلٞ مِّن رَّبِّكَ بِٱلۡحَقِّۖ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلۡمُمۡتَرِينَ

Transliteration: (Afaghairal laahi abtaghee hakamanw wa Huwal lazee anzala ilaikumul Kitaaba mufassalaa; wallazeena atai naahumul Kitaaba ya'lamoona annahoo munazzalum mir Rabbika bilhaqqi falaa takoonanna minal mumtareen)

और क्या मैं अल्लाह के सिवा किसी और से फ़ैसला [247] चाहूँ, जबकि वही है जिसने तुम्हारी तरफ यह तफ़सील वाली किताब [248] उतारी है? और जिनको हमने किताब [249] दी है, वे जानते हैं कि यह तुम्हारे रब की तरफ से हक़ के साथ उतारी गई है। तो तुम शक करने वालों में से न हो [250]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 114 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 114 की तफ़्सीर

 

✅ [247]यह स्पष्ट करता है कि दीन का कोई भी फ़ैसला अल्लाह के अलावा किसी और से नहीं लिया जाना चाहिए। दुनियावी मामलों जैसे शादी-ब्याह में सलाह या सुलह हो सकती है, लेकिन सलात, रोज़ा जैसे धार्मिक हुक्म सिर्फ अल्लाह से लिए जाएँ।

✅ [248]

मक्का के काफ़िरों ने सुझाव दिया कि ईसाई और यहूदी पंडितों को हाकिम बनाया जाए ताकि वे हक़ और गुमराही का फ़ैसला करें। उनका मक़सद था कि इनको रिश्वत देकर अपने पक्ष में फैसला करवाएँ। इस आयत में उस सुझाव को रद्द किया गया और यह बयान किया गया कि क़ुरआन हर चीज़ की तफ़सील बताने वाली किताब है।

✅ [249]

यह उन लोगों की तरफ इशारा करता है जिन्हें आसमान से उतारी गई किताबों का सही इल्म दिया गया था, जैसे हज़रत अब्दुल्लाह इब्न सलाम। या फिर उन अहल-ए-किताब के बड़े आलिमों की तरफ जो दिल से नबी ﷺ को सच्चा मानते थे लेकिन दुनियावी मक़सद से खुलकर इकरार नहीं करते थे।

✅ [250]

जिन पंडितों और पोपों को काफ़िर हाकिम बनाना चाहते थे, वे दिल से नबी ﷺ को सच्चा मानते हैं, चाहे ज़ाहिर में इनकार करते हों या आगे करेंगे।

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