Transliteration: (Wa kazaalika ja'alnaa likulli nabiyyin 'aduwwan Shayaateenal insi waljinni yoohee ba'duhum ilaa ba'din zukhrufal qawli ghurooraa; wa law shaaa'a Rabbuka maa fa'aloohu fazarhum wa maa yaftaroon)
यह आयत बताती है कि इंसान और जिन्न के अलावा अल्लाह की बाकी सारी मख़लूक़ नबी ﷺ और अल्लाह के बंदों की फ़रमांबरदार है। इंसान और जिन्न के अलावा कोई मख़लूक़ न तो काफ़िर है और न ही नबी ﷺ की दुश्मन। नबी ﷺ का यह कहना कि पहाड़ हमारे साथ दुश्मनी रखते हैं, एक रूपक है, जिसका मतलब मदीना के यहूदी लोग हैं, न कि पत्थर।
कोई भी व्यक्ति जो दीन के ख़िलाफ़ ख़्वाहिशात पैदा करने की कोशिश करे, वह शैतान कहलाता है, चाहे वह रिश्तेदार हो या आलिम। यह बताता है कि गुमराह करने वाली बातें क़रीबी रिश्तेदारों या बाहरी तौर पर दीनी लगने वालों से भी आ सकती हैं।
जैसे हर नबी के दुश्मन थे, वैसे ही उलमा और औलिया के भी होंगे। ऐसा आलिम जिसके दुश्मन बेदीन लोगों में न हों, वह ख़ुद बेदीन हो सकता है, क्योंकि वह हद से ज़्यादा नरमी बरतता है। यह दुश्मनी एक इलाही हिकमत रखती है: मु opposition से असल ताक़त ज़ाहिर होती है। अंधेरा न हो तो सूरज की रोशनी की क़द्र नहीं होती; प्यास न हो तो पानी की अहमियत नहीं समझ आती।
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