Transliteration: (Wa yawma yahshuruhum jamee'ai yaa ma'sharal jinni qadistaksartum minal insi wa qaala awliyaa'uhum minal insi Rabbanas tamta'a ba'dunaa biba'dinw wa balaghnaaa ajalannal lazeee ajjalta lanaa; qaalan Naaru maswaakum khaalideena feehaaa illaa maa shaaa'allaah; inna Rabbaka Hakeemun 'Aleem)
यह यौमुल-हश्र है, जब सब मख़लूक़ — ईमान वाले और कुफ़्र वाले, इंसान और जिन्न, नेक और बदकार — एक साथ उठाए जाएँगे।
इसके बाद अलगाव होगा, और वह दिन यौमुल-फ़स्ल (फ़ैसले का दिन) बन जाएगा, जब हर एक को उसका अंजाम सुनाया जाएगा।
यह ख़िताब सरकश जिन्नों से है जिन्होंने इंसानों को गुमराह किया।
ईमान वाले जिन्न रहमत के हक़दार होंगे, जबकि बदकार जिन्नों पर लानत होगी।
वे इंसानों के दिलों में वसवसे डालते हैं, बुराई की तरफ़ खींचते हैं और रास्ते से भटकाते हैं — ख़ास तौर पर शैतान और उसकी औलाद।
इंसानों ने जिन्नों से गुनाह के रास्ते पर मदद ली, और जिन्न इंसानों की इबादत व आज्ञापालन से खुश हुए।
यह एक फ़ासिद (बुरा) गठजोड़ था, जो दुनिया में कुछ लुत्फ़ देता था लेकिन आख़िरकार दोनों को बर्बादी में ले गया।
यह आयत उनके शेयर किए गए गुनाह और बेकार रिश्ते को फ़ाश करती है।
"मुक़र्रर वक़्त" से मुराद है — हर शख़्स के लिए मौत और सबके लिए क़ियामत का दिन।
इंसान और जिन्न दोनों मान लेंगे कि यह वक़्त अल्लाह ने तय किया था।
"मगर जैसा अल्लाह चाहे" का मतलब है — वे लोग जो अल्लाह के फ़ैसले से ईमान पर मरेंगे, वो जहन्नम में दाख़िल नहीं होंगे।
इसका यह मतलब नहीं कि कोई काफ़िर बाद में जहन्नम से निकाला जाएगा।
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