Transliteration: (Sayaqoolul lazeena ashrakoo law shaaa'al laahu maaa ashraknaa wa laaa aabaaa'unaa wa laa harramnaa min shai'; kazaalika kazzabal lazeena min qablihim hattaa zaaqoo ba'sanaa; qul hal 'indakum min 'ilmin fatukh rijoohu lanaa in tattabi'oona illaz zanna wa in antum illaa takhhrusoon)
यह आयत पहले ही बता देती है कि मुशरिक़ लोग अपने शिर्क के लिए यही दलील देंगे कि अगर अल्लाह चाहता तो वे शिर्क न करते। यह उनकी ग़लत सोच और बहाना है।
उन्होंने अल्लाह की मशीयत (इरादा) को उसकी रज़ा (खुशी) समझ लिया। जबकि बहुत से काम अल्लाह की मशीयत से होते हैं, मगर वह उनसे राज़ी नहीं होता। शिर्क भी अल्लाह की मशीयत से है, मगर उसकी मर्ज़ी और मंज़ूरी से नहीं।
पहले की क़ौमें भी इसी तरह गुनाहों का जواز पेश करती रहीं, लेकिन जब उन्होंने हक़ को झुटलाया, तो उन पर अल्लाह का अज़ाब आकर रहा।
अल्लाह की मर्ज़ी और हुक्म का इल्म सिर्फ़ वही (वही-ए-इलाही) से मालूम होता है, न कि इंसानी तर्क या क़िस्मत के अटकलों से।
इस आयत से मालूम हुआ कि किसी झूटे दावेदार से उसकी दलील माँगी जा सकती है—ताकि उसका झूठ सामने आ जाए, न कि उस पर यक़ीन करने के लिए।
ईमान और अक़ीदा सिर्फ़ यक़ीनी और साफ़ दलील पर क़ायम होता है। मुशरिक़ों का बहाना सिर्फ़ अंदाज़ा और अटकलें थीं, जिनकी शरई तौर पर कोई हैसियत नहीं।
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