Transliteration: (Ulaaa'ikal lazeena aatainaahumul Kitaaba wal hukma wan Nubuwwah; fa iny yakfur bihaa haaa'ulaaa'i faqad wakkalnaa bihaa qawmal laisoo bihaa bikaafireen)
यहाँ किताब से मुराद कोई भी इलाही किताब है—चाहे पूरी हो, सहिफ़ों की शक्ल में हो, या हिस्सों में नाज़िल हुई हो। हर नबी को पूरी किताब नहीं दी गई; कुछ जैसे हारून और दाऊद عليهم السلام ने मूसा عليه السلام पर नाज़िल तौरात की तालीम दी। कुछ, जैसे आदम عليه السلام को सहिफ़े दिए गए, जिन्हें बाद के नबी आगे पहुँचाते रहे।
यह आयत बताती है कि हर नबी के पास इलाही इल्म और हिकमत होती है, जिसमें किताबों को समझना और सिखाना शामिल है। कुछ पिछले वही की तालीम देते हैं, लेकिन कोई भी नबी नुबूवत में दूसरे का मातहत नहीं होता। हर नबी मुकम्मल और अल्लाह के चुने हुए होते हैं।
यहाँ इंकार से मुराद मक्का के काफ़िर, ख़ास तौर पर क़ुरैश के सरदार हैं, जिन्होंने हक़ और मौजिज़ात देखकर भी आख़िरी दम तक इंकार किया। उनका इंकार पक्का और जानबूझकर था।
अल्लाह फ़रमा रहा है कि अगर मौजूदा लोग हक़ को ठुकराएँ, तो वह इसे ऐसे लोगों के हवाले कर देगा जो इसे कभी ठुकराएँगे नहीं। यह पेशीनगोई सहाबा—मुहाजिरीन, अंसार और आने वाली नेक नस्लों—के ज़रिये पूरी हुई, जिन्होंने इस्लाम को फैलाया और सँभाला। यह सिखाती है कि दीनी खिदमत एक इलाही इनाम है, हक़ नहीं, और इसे शुक्र और आज़्माइश के साथ निभाना चाहिए।
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