कुरान - 6:91 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

91
وَمَا قَدَرُواْ ٱللَّهَ حَقَّ قَدۡرِهِۦٓ إِذۡ قَالُواْ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ عَلَىٰ بَشَرٖ مِّن شَيۡءٖۗ قُلۡ مَنۡ أَنزَلَ ٱلۡكِتَٰبَ ٱلَّذِي جَآءَ بِهِۦ مُوسَىٰ نُورٗا وَهُدٗى لِّلنَّاسِۖ تَجۡعَلُونَهُۥ قَرَاطِيسَ تُبۡدُونَهَا وَتُخۡفُونَ كَثِيرٗاۖ وَعُلِّمۡتُم مَّا لَمۡ تَعۡلَمُوٓاْ أَنتُمۡ وَلَآ ءَابَآؤُكُمۡۖ قُلِ ٱللَّهُۖ ثُمَّ ذَرۡهُمۡ فِي خَوۡضِهِمۡ يَلۡعَبُونَ

Transliteration: (Wa maa qadarul laaha haqqa qadriheee iz qaaloo maaa anzalal laahu 'alaa basharim min shai'; qul man anzalal Kitaabal lazee jaaa'a bihee Moosaa nooranw wa hudal linnaasi taj'aloonahoo qaraateesa tubdoonahaa wa tukhfoona kaseeranw wa 'ullimtum maa lam ta'lamooo antum wa laaa aabaaa'ukum qulil laahu summa zarhum fee khawdihim yal'aboon)

उन्होंने कहा कि अल्लाह ने किसी इंसान पर कुछ नाज़िल नहीं किया। कह दीजिए (यहूद से): किसने वह किताब नाज़िल की जो मूसा लेकर आए, जो लोगों के लिए रोशनी और हिदायत थी [186]? तुमने उसे अलग-अलग काग़ज़ों में कर दिया, कुछ को ज़ाहिर करते हो और बहुत सा छुपाते हो [187]। और तुम्हें वह सिखाया गया जो न तुम जानते थे और न तुम्हारे बाप-दादा [189]। कह दीजिए: अल्लाह [190]। फिर उन्हें उनके झूठ में खेलते हुए छोड़ दो [191] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 91 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 91 की तफ़्सीर

✅ [184] यहूदी आलिम का घमंडी इंकार

यह आयत उस वक़्त नाज़िल हुई जब मालिक बिन सैफ़ नाम के एक यहूदी आलिम ने हुज़ूर ﷺ से बहस में हारकर घमंड से कह दिया कि अल्लाह ने किसी इंसान पर कुछ नाज़िल नहीं किया। यह बात उसकी अपनी किताबों के ख़िलाफ़ थी। आयत ने साफ़ कर दिया कि जो नबी ﷺ को पहचान ले, वही असल में अल्लाह को पहचान सकता है।

✅ [185] अपनी ही किताब से उनकी पोल खोलना

हुज़ूर ﷺ ने तौरात की वह आयत याद दिलाई जिसमें ऐश-ओ-आराम पसंद पूजारियों की निंदा थी। बेज़ती महसूस कर, मालिक ने ही वही का इंकार कर दिया। अल्लाह ने उससे पूछा: फिर तौरात किसने नाज़िल की? इस तरह उनके ग़लत इस्तेमाल और हराम कमाई का पर्दाफ़ाश किया गया।

✅ [186] तौरात पहले मुकम्मल थी, बाद में सीमित रह गई

यहाँ रोशनी और हिदायत से मुराद वह तौरात है जो बनी इसराईल पर नाज़िल हुई। पहले उसमें मुकम्मल तफ़सीलें थीं, लेकिन जब अलواح मूसा عليه السلام के हाथ से गिरीं, तो सिर्फ़ हिदायत बाक़ी रही। इस तरह क़ुरआन के बयान में कोई तकरार नहीं।

✅ [187] हुक्म छुपाना और चुनिंदा हिस्सा बताना

बनी इसराईल के आलिम तौरात के कुछ हिस्से लोगों को बताते और बाकी छुपा लेते थे, ताकि उस पर उनका क़ाबू रहे। इसके उलट क़ुरआन सबके लिए खुला और हमेशा के लिए महफ़ूज़ है।

✅ [188] तौरात की हिफ़ाज़त में नाकाम रहे

अल्लाह ने तौरात की हिफ़ाज़त का काम बनी इसराईल को दिया था, लेकिन उन्होंने इसे बिगाड़ दिया। इसके बरअक्स, क़ुरआन की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी अल्लाह ने खुद ली, और यह हमेशा मेहफ़ूज़ रहेगा।

✅ [189] नबी ﷺ के ज़रिये बे-मिसाल इल्म

नबी ﷺ के ज़रिये उम्मत को वह इल्म मिला जो पहले किसी उम्मत या आलिम को भी हासिल नहीं हुआ। यह आख़िरी नबी ﷺ के मुकाम को मानने और क़द्र करने की दावत है।

✅ [190] बिना हिचकिचाहट अल्लाह का नाम लो

मालिक बिन सैफ़ जैसे मुंह फेरने वालों को जवाब देते हुए कहा गया कि डटकर कहो कि इसे अल्लाह ने नाज़िल किया। सच्चाई में कोई समझौता नहीं।

✅ [191] उन्हें छोड़ दो, उनका झूठ उन्हें ले डूबेगा

आख़िर में कहा गया कि उनके इंकार पर अफ़सोस न करो। यह दावत-ए-हक़ से रोकने का हुक्म नहीं, बल्कि मतलब है कि उन्हें उनके गुमराही में भटकने दो, उनका हिसाब वक़्त आने पर हो जाएगा।

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