Transliteration: (Wa maa qadarul laaha haqqa qadriheee iz qaaloo maaa anzalal laahu 'alaa basharim min shai'; qul man anzalal Kitaabal lazee jaaa'a bihee Moosaa nooranw wa hudal linnaasi taj'aloonahoo qaraateesa tubdoonahaa wa tukhfoona kaseeranw wa 'ullimtum maa lam ta'lamooo antum wa laaa aabaaa'ukum qulil laahu summa zarhum fee khawdihim yal'aboon)
यह आयत उस वक़्त नाज़िल हुई जब मालिक बिन सैफ़ नाम के एक यहूदी आलिम ने हुज़ूर ﷺ से बहस में हारकर घमंड से कह दिया कि अल्लाह ने किसी इंसान पर कुछ नाज़िल नहीं किया। यह बात उसकी अपनी किताबों के ख़िलाफ़ थी। आयत ने साफ़ कर दिया कि जो नबी ﷺ को पहचान ले, वही असल में अल्लाह को पहचान सकता है।
हुज़ूर ﷺ ने तौरात की वह आयत याद दिलाई जिसमें ऐश-ओ-आराम पसंद पूजारियों की निंदा थी। बेज़ती महसूस कर, मालिक ने ही वही का इंकार कर दिया। अल्लाह ने उससे पूछा: फिर तौरात किसने नाज़िल की? इस तरह उनके ग़लत इस्तेमाल और हराम कमाई का पर्दाफ़ाश किया गया।
यहाँ रोशनी और हिदायत से मुराद वह तौरात है जो बनी इसराईल पर नाज़िल हुई। पहले उसमें मुकम्मल तफ़सीलें थीं, लेकिन जब अलواح मूसा عليه السلام के हाथ से गिरीं, तो सिर्फ़ हिदायत बाक़ी रही। इस तरह क़ुरआन के बयान में कोई तकरार नहीं।
बनी इसराईल के आलिम तौरात के कुछ हिस्से लोगों को बताते और बाकी छुपा लेते थे, ताकि उस पर उनका क़ाबू रहे। इसके उलट क़ुरआन सबके लिए खुला और हमेशा के लिए महफ़ूज़ है।
अल्लाह ने तौरात की हिफ़ाज़त का काम बनी इसराईल को दिया था, लेकिन उन्होंने इसे बिगाड़ दिया। इसके बरअक्स, क़ुरआन की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी अल्लाह ने खुद ली, और यह हमेशा मेहफ़ूज़ रहेगा।
नबी ﷺ के ज़रिये उम्मत को वह इल्म मिला जो पहले किसी उम्मत या आलिम को भी हासिल नहीं हुआ। यह आख़िरी नबी ﷺ के मुकाम को मानने और क़द्र करने की दावत है।
मालिक बिन सैफ़ जैसे मुंह फेरने वालों को जवाब देते हुए कहा गया कि डटकर कहो कि इसे अल्लाह ने नाज़िल किया। सच्चाई में कोई समझौता नहीं।
आख़िर में कहा गया कि उनके इंकार पर अफ़सोस न करो। यह दावत-ए-हक़ से रोकने का हुक्म नहीं, बल्कि मतलब है कि उन्हें उनके गुमराही में भटकने दो, उनका हिसाब वक़्त आने पर हो जाएगा।
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