Transliteration: (Wa maaa arsalnaaka illaa rahmatal lil'aalameen)
"और (ऐ महबूब!) हमने आपको न भेजा मगर तमाम जहानों के लिए रहमत बनाकर [166] ।"
यह क़ुरआने मजीद की निहायत अज़ीम आयते करीमा है। जिस तरह अल्लाह तआला 'रब्बुल आलमीन' है, उसी तरह उसने अपने हबीब मुहम्मद मुस्तफ़ा (ﷺ) को 'रहमतुल-लिल-आलमीन' (तमाम जहानों के लिए रहमत) बनाकर भेजा:
जहानों की वुसअत: इंसान, जिन्नात, फ़रिश्ते, जमादात, नबातात, हैवानात, दुनिया और आख़िरत — जहाँ तक ख़ुदाई की सल्तनत है, वहाँ तक हुज़ूर (ﷺ) की रहमत का साया फैला हुआ है।
मोमिनों के लिए: आप ईमान, हिदायत, शफ़ाअत और जन्नत की नेअमतों की रहमत हैं।
काफ़िरों के लिए: हुज़ूर (ﷺ) के सबब पिछली क़ौमों की तरह आम हलाक करने वाले अज़ाब (मसलन सूरतें बिगड़ जाना या पत्थर बरसना) से दुनिया में मुअत्तर कर दिया गया।
फ़रिश्तों के लिए: हज़रत जिब्रील (अलैहिस्सलाम) ने अर्ज़ किया कि मुझे भी आपके सदक़े अपने अंजाम से इत्मीनान की रहमत हासिल हुई।
हुज़ूर (ﷺ) की ज़ाते अक़्दस अल्लाह की रहमते मुजस्सम है जिसका फ़ैज़ कयामत तक और उसके बाद भी जारी व सारी रहेगा।
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