Transliteration: (Iqtaraba linnaasi hisaabuhum wa hum fee ghaflatim mu'ridoon)
"लोगों का हिसाब उनके क़रीब आ पहुँचा [1] और वे ग़फ़लत में मुंह फेरे हुए हैं [2] ।"
यहाँ 'लोगों' से मुराद कुफ़्फ़ार व मुनकिरीन हैं, जैसा कि अगली आयतों के सियाक़ व सबाक़ से वाज़ेह होता है। और 'हिसाब' से मुराद क़ब्र का हिसाब या क़ियामत का मुहासिबा है।
चूंकि नबी करीम (ﷺ) आख़िरी नबी हैं, इसलिए क़ियामत का वक़्त पिछली उम्मतों के मुक़ाबले में निहायत क़रीब आ चुका है। हुज़ूर (ﷺ) ने फ़रमाया कि मेरे और क़ियामत के बीच कोई नबी नहीं।
यह दुनिया आख़िरत की खेती है, और आख़िरत वह जगह है जहाँ इंसान अपने बोए हुए आमाल की फ़सल काटेगा। लिहाज़ा हर लम्हे को ग़नीमत जानकर नेक आमाल का ज़ख़ीरा करना चाहिए।
इससे मालूम हुआ कि दुनिया के ऐश व इशरत में डूबकर आख़िरत को भुला देना काफ़िरों का तरीक़ा है।
सच्चे मोमिन की शान यह है कि वह इस दुनियावी ज़िंदगी को आख़िरत के तोशे (तैयारी) का ज़रिया बनाए, न कि फ़ानी लज़्ज़तों में पड़कर अपनी दायमी मंज़िल को बर्बाद करे।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat