कुरान - 21:3 सूरह अल-अंबिया अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

3
لَاهِيَةٗ قُلُوبُهُمۡۗ وَأَسَرُّواْ ٱلنَّجۡوَى ٱلَّذِينَ ظَلَمُواْ هَلۡ هَٰذَآ إِلَّا بَشَرٞ مِّثۡلُكُمۡۖ أَفَتَأۡتُونَ ٱلسِّحۡرَ وَأَنتُمۡ تُبۡصِرُونَ

Transliteration: (Laahiyatan quloobuhum; wa asarrun najwal lazeena zalamoo hal haazaaa illaa basharum mislukum 'afa ta'toonas sihra wa antum tubsiroon)

3. उनके दिल खेल में पड़े हैं [5]; और ज़ालिमों ने आपस में चुपके-चुपके मशवरा किया [6] कि 'ये कौन हैं? क्या ये तुम्हारी तरह के एक बशर ही नहीं हैं? क्या तुम आँखें देखते जादू के पास जाते हो?' [7] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अंबिया आयत 3 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंबिया — आयत 3 की तफ़सीर

"उनके दिल खेल में पड़े हैं [5]; और ज़ालिमों ने आपस में चुपके-चुपके मशवरा किया [6] कि 'ये कौन हैं? क्या ये तुम्हारी तरह के एक बशर ही नहीं हैं? क्या तुम आँखें देखते जादू के पास जाते हो?' [7]"

[5] दिलों का बेफ़िक्री और दुनियावी लह्व में पड़ना

उनके दिल दुनियावी लह्वो-लब (खेल-तमाशे) में ऐसे ग़र्क़ हो चुके हैं कि क़ुरआन की हौलनाक चेतावनियाँ भी उन पर असर नहीं करतीं।

[6] ज़ालिमों की सरगोशियां और बशरियत पर एतराज़

मक्के के मुशरिकों ने चुपके-चुपके साज़िशें रचीं और ताना दिया कि 'यह तो हमारी तरह के एक इंसान हैं, फिर इन्हें नबी कैसे मान लें?'

यह गुमराहों का क़दीम तरीक़ा रहा है कि वे अंबिया-ए-किराम की नूरी हक़ीक़त, इस्मत और मक़ाम को छोड़कर सिर्फ़ उनकी ज़ाहिरी बशरियत पर निगाह रखते हैं और इसी वजह से ईमान से महरूम रह जाते हैं।

[7] हक़ीक़त को देखकर भी जादू का बोहतान

वे क़ुरआने मजीद की बेमिसाल फ़साहत, तासीर और मोजिज़ाती कलाम को देखकर भी हठधर्मी में उसे 'जादू' कहने लगे। जानते-बूझते हक़ को जादू कहना उनके शदीद इनआद और बुग़्ज़ की अलामत थी।

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