कुरान - 21:2 सूरह अल-अंबिया अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

2
مَا يَأۡتِيهِم مِّن ذِكۡرٖ مِّن رَّبِّهِم مُّحۡدَثٍ إِلَّا ٱسۡتَمَعُوهُ وَهُمۡ يَلۡعَبُونَ

Transliteration: (Maa ya'teehim min zikrim mir Rabbihim muhdasin illas tama'oohu wa hum yal'aboon)

2. जब उनके पास उनके रब की तरफ़ से कोई नई नसीहत आती है [3], तो वे उसे खेल-तमाशे में ही सुनते हैं [4] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अंबिया आयत 2 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंबिया — आयत 2 की तफ़सीर

"जब उनके पास उनके रब की तरफ़ से कोई नई नसीहत आती है [3], तो वे उसे खेल-तमाशे में ही सुनते हैं [4] ।"

[3] कलाम-ए-इलाही की दायमी ताज़गी

अल्लाह तआला का कलाम क़दीम (हमेशा से) है, मगर बंदों पर इसका नुज़ूल ब-तदरीज और वक़्तन-फ़वक़्तन होता रहा। यहाँ 'मुहदस' (नई नसीहत) से मुराद यह है कि जो सूरत या आयत जब नाज़िल होती है, वह सुनने वालों के लिए ताज़ा और नई होती है।

यह हिदायत-ए-इलाहिया की उस हिकमत को ज़ाहिर करता है जो हर ज़माने और हर ज़रूरत के मुताबिक़ बंदों की रहनुमाई करती है।

[4] मज़ाक़ और ग़फ़लत से कलाम सुनना

इससे मुराद वे मुनकिरीन हैं जो क़ुरआने मजीद को संजीदगी और हिदायत की नीयत से नहीं सुनते, बल्कि मज़ाक़ उड़ाने और एतराज़ात गढ़ने के लिए सुनते हैं।

उनके कान अल्फ़ाज़ की आवाज़ तो सुनते हैं, मगर उनके दिल ग़फ़लत और खेल-कूद में डूबे रहने के सबब नसीहत के नूर से महरूम रहते हैं।

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