Transliteration: (Amit takhazoo min doonihee aalihatan qul haatoo burhaanakum haaza zikru mam ma'iya wa zikru man qablee; bal aksaruhum laa ya'lamoonal haqqa fahum mu'ridoon)
"क्या उन्होंने उसके सिवा दूसरे माबूद बना लिए हैं? कह दीजिए कि 'अपनी दलील पेश करो [34]! यह (क़ुरआन) मौजूद है जो मेरे साथ वालों का ज़िक्र है [35] और मुझसे पहले वालों की ख़बरें हैं;' बल्कि उनमें से अक्सर लोग हक़ को नहीं जानते, इसलिए वे मुंह फेरे हुए हैं [36] ।"
अल्लाह तआला ने मुशरिकों को खुली चुनौती दी कि अगर तुम्हारे शिर्क और बुतपरस्ती के हक़ में कोई अक़ली या नक़ली दलील है तो उसे सामने लाओ। इससे मालूम हुआ कि झूठे मुद्दई को बे-नक़ाब करने के लिए उससे दलील तलब करना जाइज़ और सुन्नत है। शिर्क के हक़ में कायनात में कोई दलील मौजूद नहीं।
'मेरे साथ वालों का ज़िक्र' से मुराद हुज़ूर (ﷺ) की उम्मत के अहकाम व हिदायात हैं, और 'मुझसे पहले वालों की ख़बरें' से मुराद पिछली उम्मतों और आसमानी किताबों (तौरैत, इंजील, ज़बूर) के अहवाल हैं। तमाम आसमानी किताबों का बुनियादी पैग़ाम तौहीद ही रहा है; किसी किताब में शिर्क की गुंजाइश नहीं।
काफ़िरों के कुफ़्र का बड़ा सबब यह है कि वे हक़ से पूरी तरह बे-ख़बर और जाहिल हैं। आवाम जहालत की वजह से गुमराह हैं, और उनके सरदार हसद और तअस्सुब के सबब हक़ को झुठलाते हैं।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat