कुरान - 21:25 सूरह अल-अंबिया अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

25
وَمَآ أَرۡسَلۡنَا مِن قَبۡلِكَ مِن رَّسُولٍ إِلَّا نُوحِيٓ إِلَيۡهِ أَنَّهُۥ لَآ إِلَٰهَ إِلَّآ أَنَا۠ فَٱعۡبُدُونِ

Transliteration: (Wa maaa arsalnaa min qablika mir Rasoolin illaa nooheee ilaihi annahoo laaa ilaaha illaaa Ana fa'budoon)

25. और हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजा, उसकी तरफ़ यही वह्य की [37] कि 'मेरे सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं, पस मेरी ही इबादत करो' [38] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अंबिया आयत 25 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंबिया — आयत 25 की तफ़सीर

"और हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजा, उसकी तरफ़ यही वह्य की [37] कि 'मेरे सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं, पस मेरी ही इबादत करो' [38] ।"

[37] वह्य: नबुव्वत की लाज़मी बुनियाद

इस आयत से साफ़ ज़ाहिर है कि हर नबी और रसूल पर वह्य-ए-इलाही का नुज़ूल लाज़मी है। अल्लाह तआला ने आदम (अलैहिस्सलाम) से लेकर हुज़ूर ख़ातमुन्नबीय्यीन (ﷺ) तक जितने अंबिया भेजे, सबको वह्य के ज़रिये ही हिदायत का पैग़ाम अता फ़रमाया।

[38] अक़ीदा-ए-तौहीद: तमाम अंबिया की मुश्तरका दावत

तमाम अंबिया-ए-किराम की शरीअतों के अहकाम व फ़ुरूआत में तो तफ़ावुत (फ़र्क़) रहा, मगर अक़ीदा-ए-तौहीद सब में यकसां और मुत्तफ़िक़ा रहा:

  • हर नबी की पहली दावत यही थी: "ला इलाहा इल्लल्लाह" (अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं)।

  • इबादत सिर्फ़ अल्लाह ही के लिए ख़ास है; किसी मख़लूक़ को माबूद या ख़ुदाई में शरीक मानना हमेशा से बातिल और हराम रहा है।

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