Transliteration: (Wa maaa arsalnaa min qablika mir Rasoolin illaa nooheee ilaihi annahoo laaa ilaaha illaaa Ana fa'budoon)
"और हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजा, उसकी तरफ़ यही वह्य की [37] कि 'मेरे सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं, पस मेरी ही इबादत करो' [38] ।"
इस आयत से साफ़ ज़ाहिर है कि हर नबी और रसूल पर वह्य-ए-इलाही का नुज़ूल लाज़मी है। अल्लाह तआला ने आदम (अलैहिस्सलाम) से लेकर हुज़ूर ख़ातमुन्नबीय्यीन (ﷺ) तक जितने अंबिया भेजे, सबको वह्य के ज़रिये ही हिदायत का पैग़ाम अता फ़रमाया।
तमाम अंबिया-ए-किराम की शरीअतों के अहकाम व फ़ुरूआत में तो तफ़ावुत (फ़र्क़) रहा, मगर अक़ीदा-ए-तौहीद सब में यकसां और मुत्तफ़िक़ा रहा:
हर नबी की पहली दावत यही थी: "ला इलाहा इल्लल्लाह" (अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं)।
इबादत सिर्फ़ अल्लाह ही के लिए ख़ास है; किसी मख़लूक़ को माबूद या ख़ुदाई में शरीक मानना हमेशा से बातिल और हराम रहा है।
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