कुरान - 21:28 सूरह अल-अंबिया अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

28
يَعۡلَمُ مَا بَيۡنَ أَيۡدِيهِمۡ وَمَا خَلۡفَهُمۡ وَلَا يَشۡفَعُونَ إِلَّا لِمَنِ ٱرۡتَضَىٰ وَهُم مِّنۡ خَشۡيَتِهِۦ مُشۡفِقُونَ

Transliteration: (Ya'lamu maa baina aideehim wa maa khalfahum wa laa yashfa'oona illaa limanir tadaa wa hum min khash yatihee mushfiqoon)

28. वह जानता है जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ उनके पीछे है, और वे किसी की शफ़ाअत (सिफ़ारिश) नहीं करते सिवाय उसके जिसके लिए वह (अल्लाह) राज़ी हो [41]; और वे उसकी हैबत से डरते रहते हैं [42] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अंबिया आयत 28 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंबिया — आयत 28 की तफ़सीर

"वह जानता है जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ उनके पीछे है, और वे किसी की शफ़ाअत (सिफ़ारिश) नहीं करते सिवाय उसके जिसके लिए वह (अल्लाह) राज़ी हो [41]; और वे उसकी हैबत से डरते रहते हैं [42] ।"

[41] शफ़ाअत (सिफ़ारिश) इज़्ने इलाही से मशरूत है

काफ़िर कहते थे कि हमारे बुत या फ़रिश्ते ख़ुदा के यहाँ ज़बरदस्ती हमारी बख़्शिश करा लेंगे। इस आयत ने साफ़ कर दिया कि शफ़ाअत अल्लाह की रज़ा और इजाज़त के बग़ैर मुम्किन नहीं:

  • अल्लाह तआला सिर्फ़ अहले ईमान से राज़ी है, लिहाज़ा शफ़ाअत सिर्फ़ ईमान वालों के लिए होगी, चाहे वे गुनाहगार ही क्यों न हों।

  • काफ़िरों और मुशरिकों पर अल्लाह का ग़ज़ब है, इसलिए उनके लिए किसी की कोई शफ़ाअत क़बूल नहीं होगी।

[42] फ़रिश्तों की ख़शियत और हैबत-ए-इलाही

फ़रिश्ते मासूम और गुनाहों से पाक होने के बावजूद अल्लाह की अज़्मत और जलाल की हैबत से हर वक़्त लरज़ाँ व तरसाँ रहते हैं। यह ख़ौफ़ सज़ा का नहीं, बल्कि अल्लाह के जलाल और उसकी किबरियाई की हक़ीक़ी मअरिफ़त का ख़ौफ़ (ख़शियत) है।

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