Transliteration: (Qul mai yakla 'ukum billaili wannahaari minar Rahmaan; bal hum 'an zikri Rabbihim mu'ridoon)
"कह दीजिए कि 'रात और दिन में रहमान (के अज़ाब) से तुम्हारी हिफ़ाज़त कौन कर सकता है [66]?' बल्कि वे तो अपने रब की याद से मुंह मोड़े हुए हैं [67] ।"
इंसान रात को नींद में हो या दिन में अपने कामों में मशग़ूल, हर लम्हा हादसात और आफ़ात के ख़तरात में घिरा रहता है। अल्लाह तआला के सिवा कोई ज़ात ऐसी नहीं जो रात और दिन में बंदे की मुहाफ़िज़ बन सके। अगर रहमान का अज़ाब आ पहुंचे, तो कोई ताक़त उसे टाल नहीं सकती।
इस नेअमत और हिफ़ाज़त के बावजूद काफ़िरों का हाल यह है कि वे अपने रब की याद, उसकी किताब और उसकी इबादत से मुंह मोड़े हुए हैं। जो ज़ात उन्हें हर लम्हा ज़िन्दगी और हिफ़ाज़त बख़्शती है, उसी के ज़िक्र से ग़फ़लत बरतना खुली ना-शुक्री है।
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