Transliteration: (Bal matta'naa haaa'ulaaa'i wa aabaaa'ahum hattaa taala 'alaihimul 'umur; afalaa yarawna anna na'til arda nanqusuhaa min atraafihaa; afahumul ghaaliboon)
"बल्कि हमने उन लोगों को और उनके बाप-दादा को ऐश व आराम का सामान दिया यहाँ तक कि उनकी उम्रें लम्बी हो गईं [70]; तो क्या वे नहीं देखते कि हम ज़मीन को उसके किनारों से घटाते चले आ रहे हैं [71]? तो क्या वे ही ग़ालिब रहने वाले हैं?"
काफ़िरों को दुनिया में जो माल, दौलत, सेहत और लम्बी उम्रें अता हुईं, वे इसे अपनी हक़्क़ानियत समझ बैठे। अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि यह नेअमत नहीं बल्कि इस्तेदराज (ढीली रस्सी) थी ताकि उनकी हुज्जत तमाम हो। लम्बी उम्र अगर गुनाहों में गुज़रे तो वह वबाल बन जाती है।
इस आयत में इस्लाम के ग़लबे की पेशीनगोई फ़रमाई गई। रसूलुल्लाह (ﷺ) और सहाबा-ए-किराम के मुबारक हाथों से अरब और उसके आस-पास के इलाक़े फ़तह होते चले गए और कुफ़्र का दायरा सिमटता चला गया। अल्लाह तआला ने मुशरिकों को झंझोड़ा कि क्या तुम देखते नहीं कि इस्लाम चारों तरफ़ फैल रहा है और तुम्हारी हुकूमत के किनारे घटते जा रहे हैं? फिर तुम ग़ालिब आने का ख़्वाब कैसे देख सकते हो?
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