कुरान - 21:52 सूरह अल-अंबिया अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

52
إِذۡ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوۡمِهِۦ مَا هَٰذِهِ ٱلتَّمَاثِيلُ ٱلَّتِيٓ أَنتُمۡ لَهَا عَٰكِفُونَ

Transliteration: (Iz qaala li abeehi wa qawmihee maa haazihit tamaaseelul lateee antum lahaa 'aakifoon)

52. जब उन्होंने अपने बाप से कहा [83] और अपनी क़ौम से कि, 'ये कैसी मूरतें (मुजस्समे) हैं जिनकी पूजा पर तुम जमे बैठे हो [84]?' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अंबिया आयत 52 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंबिया — आयत 52 की तफ़सीर

"जब उन्होंने अपने बाप से कहा [83] और अपनी क़ौम से कि, 'ये कैसी मूरतें (मुजस्समे) हैं जिनकी पूजा पर तुम जमे बैठे हो [84]?'"

[83] हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के चचा आज़र का ज़िक्र

क़ुरआन में यहाँ 'अब' (बाप) से मुराद हज़रत इब्राहीम का चचा आज़र है, क्योंकि अरबी में चचा को भी बाप कहा जाता है। हज़रत इब्राहीम के हक़ीक़ी वालिद का नाम 'तारुख़' था जो मोमिन और मुवह्हिद थे, और हुज़ूर (ﷺ) का नस्बे मुबारक आदम से अब्दुल्लाह तक तमाम मुवह्हिदीन की पुश्तों से गुज़रा है।

[84] बातिल मूर्तियों पर एतिकाफ़ का रद्द

हज़रत इब्राहीम ने अपनी क़ौम की बुतपरस्ती पर सख्त निकार फ़रमाया कि तुमने अपने हाथों से तराशे हुए बे-जान पत्थरों और मुजस्समों को ख़ुदा बना रखा है और दिन-रात उनके सामने हाथ बांधे एतिकाफ़ किए बैठे रहते हो। यह अक़्ल और फ़ितरत दोनों के ख़िलाफ़ है।

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