कुरान - 21:94 सूरह अल-अंबिया अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

94
فَمَن يَعۡمَلۡ مِنَ ٱلصَّـٰلِحَٰتِ وَهُوَ مُؤۡمِنٞ فَلَا كُفۡرَانَ لِسَعۡيِهِۦ وَإِنَّا لَهُۥ كَٰتِبُونَ

Transliteration: (Famai ya'mal minas saalihaati wa huwa mu'minun falaa kufraana lisa'yihee wa innaa lahoo kaatiboon)

94. पस जो शख़्स नेक आमाल करे जबकि वह मोमिन भी हो, तो उसकी कोशिश की कोई नाक़द्री नहीं होगी [146]; और बेशक हम उसे (आमालनामे में) लिख रहे हैं [147] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अंबिया आयत 94 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंबिया — आयत 94 की तफ़सीर

"पस जो शख़्स नेक आमाल करे जबकि वह मोमिन भी हो, तो उसकी कोशिश की कोई नाक़द्री नहीं होगी [146]; और बेशक हम उसे (आमालनामे में) लिख रहे हैं [147] ।"

[146] आमाल की क़बूलियत के लिए ईमान की शर्त

इस आयते करीमा ने दो-टूक फ़ैसला कर दिया कि नेक आमाल का अजर सिर्फ़ उसी वक़्त मिलेगा जब बंदा बा-ईमान (मोमिन) हो। काफ़िर के अच्छे आमाल का बदला सिर्फ़ दुनिया में दे दिया जाता है, आख़िरत में उसका कोई हिस्सा नहीं। मोमिन का एक-एक नेक अमल क़द्र व सवाब का मुस्तहिक़ है।

[147] आमाल की महफ़ूज़ किताबत

फ़रिश्ते बंदों के आमाल लिखते हैं, मगर अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि 'हम उसे लिख रहे हैं'। यह मोमिनों के आमाल की अज़्मत और अल्लाह की ख़ास तवज्जोह का इज़हार है कि कोई नेकी ज़ाया न होगी।

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