कुरान - 21:95 सूरह अल-अंबिया अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

95
وَحَرَٰمٌ عَلَىٰ قَرۡيَةٍ أَهۡلَكۡنَٰهَآ أَنَّهُمۡ لَا يَرۡجِعُونَ

Transliteration: (Wa haraamun 'alaa qaryatin ahlaknaahaaa annahum laa yarji'oon)

95. और जिस बस्ती को हमने हलाक कर दिया उसके लिए यह नामुमकिन (हराम) है कि वे (दुनिया में) दोबारा वापस लौट आएं [148]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अंबिया आयत 95 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंबिया — आयत 95 की तफ़सीर

"और जिस बस्ती को हमने हलाक कर दिया उसके लिए यह नामुमकिन (हराम) है कि वे (दुनिया में) दोबारा वापस लौट आएं [148];"

[148] मौत के बाद दुनिया में वापसी नामुमकिन

यहाँ 'हराम' से मुराद मुम्तनेअ और नामुमकिन है। जिन काफ़िरों और सरकश क़ौमों को अज़ाब के ज़रिये हलाक कर दिया गया, उनके लिए दुनिया में दोबारा लौटकर तौबा करना या आमाल सुधारना क़तई नामुमकिन है। मोहलत सिर्फ़ ज़िन्दगी तक है; मौत के बाद सिर्फ़ जज़ा व सज़ा है।

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