कुरान - 8:12 सूरह अल-अन्फाल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

12
إِذۡ يُوحِي رَبُّكَ إِلَى ٱلۡمَلَـٰٓئِكَةِ أَنِّي مَعَكُمۡ فَثَبِّتُواْ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْۚ سَأُلۡقِي فِي قُلُوبِ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ ٱلرُّعۡبَ فَٱضۡرِبُواْ فَوۡقَ ٱلۡأَعۡنَاقِ وَٱضۡرِبُواْ مِنۡهُمۡ كُلَّ بَنَانٖ

Transliteration: (Iz yoohee Rabbuka ilal malaaa'ikati annee ma'akum fasabbitul lazeena aamanoo; sa ulqee fee quloobil lazeena kafarur ru'ba fadriboo fawqal a'naaqi wadriboo minhum kulla banaan)

12. जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों को वह्य की [25]: "मैं तुम्हारे साथ हूँ, इसलिए ईमान वालों को साबित क़दम रखो [26]। मैं काफ़िरों के दिलों में डर बिठा दूँगा। सो उनकी गर्दनों पर मारो और उनके हर एक उँगली के पोर-पोर को काट दो" [27]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अन्फाल आयत 12 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह अल-अंफ़ाल – आयत 12 का हिन्दी अनुवाद और तफ़्सीर

✅ [25] फ़रिश्तों पर वह्य और उनका विशेष सम्मान

यहाँ "वह्य" से मतलब है इल्हामी हिदायत, जो बद्र के मैदान में मुसलमानों की मदद के लिए आए फ़रिश्तों के दिलों में डाली गई।
इसका यह मतलब नहीं कि फ़रिश्ते डर गए थे, बल्कि अल्लाह ने "मैं तुम्हारे साथ हूँ" कहकर उनकी तशरीफ़ और मर्तबा बढ़ाया।
जिस तरह बद्र के सहाबा उम्मत में सबसे ऊँचे दर्जे पर हैं, वैसे ही ये फ़रिश्ते भी फरिश्तों में अफ़ज़ल माने जाते हैं।

✅ [26] फ़रिश्ते — ईमान वालों को हिम्मत देने का ज़रिया

यह हिस्सा बताता है कि फ़रिश्ते मुसलमानों को जंग के वक़्त दिली सुकून और हिम्मत देते हैं।
उनकी मौजूदगी ने मुसलमानों के दिलों को मज़बूत किया।
इसी तरह, रसूलअल्लाह ﷺ की रूहानी मौजूदगी, उम्मत को अल्लाह की मदद और बरकतों का ज़रिया बनती है।

✅ [27] काफ़िरों के दिलों में खौफ़ डालना

अल्लाह ने काफ़िरों के दिलों में ऐसा डर डाला कि कमज़ोर-से दिखने वाले मुसलमान भी उन्हें भारी लगने लगे।
यह खौफ़ ऐसा था कि ईमान वालों की बहादुरी और यक़ीन से दुश्मन काँप उठे।
गर्दनें काटने और उँगलियों के पोर-पोर को काटने का हुक्म, दुश्मनों की पूरी शिकस्त और बेबस हालत को बयान करता है — जिस्मानी और रूहानी दोनों तौर पर।
इससे यह भी ज़ाहिर होता है कि नबी की तालीम जंग में किस हद तक असरदार और बारीक है, जो कमज़ोर हिस्सों पर निशाना लगाने की तरबियत देती है।

✅  यह आदेश हर काफ़िर के लिए नहीं था — बल्कि युद्ध में सामने खड़े दुश्मनों के लिए था

यह बहुत अहम बात है कि यह आयत हर गैर-मुस्लिम या हर “काफ़िर” के लिए नहीं बल्कि उस समय बद्र के मैदान में मौजूद क़ुरैश के वह लोग थे जो इस्लाम को मिटाने के लिए लड़ रहे थे।
यह आदेश सिर्फ जंग के हालात में, उन दुश्मनों पर लागू हुआ जो हाथों में तलवारें लिए मुसलमानों को मारने आए थे।

इसलिए, इस आयत को बिना संदर्भ के पेश करना एक गंभीर ग़लती है।
कुछ लोग जानबूझकर इसे आधुनिक समय में नफ़रत फैलाने के लिए इस्तेमाल करते हैं, जबकि इसका असली मक़सद और संदर्भ बिलकुल अलग है —
यह आयत सिर्फ़ एक ऐतिहासिक युद्ध (बद्र) की बात कर रही है, ना कि आज के समाज के हर गैर-मुस्लिम की।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now