Transliteration: (In tastaftihoo faqad jaaa'akumul fathu wa in tantahoo fahuwa khairul lakum wa in ta'oodoo na'ud wa lan tughniya 'ankum fi'atukum shai'anw wa law kasurat wa annal laaha ma'al mu'mineen)
ग़ज़वा-ए-बद्र के वक्त काफ़िरों ने काबा पर दुआ की थी कि "जो सच्चा है उसे फ़तह मिले।"
यह आयत जवाब देती है कि सच्चाई का ग़लबा इस्लाम के हक़ में हुआ, और मुसलमान फ़तह याब हुए।
अगर काफ़िर दुश्मनी और कुफ़्र से बाज़ आ जाएं, तो यह उनके लिए ही भलाई है—
दुनियावी भी और आख़िरत की भी।
अल्लाह और उसके रसूल ﷺ को किसी की इताअत की ज़रूरत नहीं,
बल्कि फ़ायदा इंसान का अपना है।
चाहे काफ़िरों की फ़ौज कितनी भी बड़ी क्यों न हो,
अल्लाह की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कभी ग़ालिब नहीं हो सकती।
इसकी तस्दीक़ बाद के जंगों में भी हुई,
जहाँ कम तादाद वाले मुसलमानों ने बहुत बड़ी फ़ौजों को शिकस्त दी।
अल्लाह का "साथ" होने का मतलब उसकी रहमत, नुसरत और बरकत है।
काफ़िरों पर उसका ग़ज़ब है, जबकि ईमान वालों पर उसकी मदद और फ़ज़ल।
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