Transliteration: (Inna sharrad dawaaabbi 'indal laahis summul bukmul lazeena laa ya'qiloon)
यह आयत बनी अब्दुद्दार बिन क़ुसै के बारे में नाज़िल हुई,
जो हठ से कहते थे: "हम तो नबी ﷺ की बातों के लिए बहरे और अंधे हैं।"
उनका यह इन्कार उन्हें जानवरों से भी नीचा बना देता था,
क्योंकि जानवर कम से कम अपने फ़ायदे और नुकसान को पहचानते हैं,
लेकिन उन्होंने हक़ से कोई लाभ न उठाया।
हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) को भी हुक्म हुआ कि जानवरों को जहाज़ में बिठाओ,
लेकिन काफ़िरों को जगह न दो।
इससे साफ़ हुआ कि हक़ को ठुकराने वाले
जानवरों से भी बदतर माने जाते हैं।
इस क़बीले के ज़्यादातर लोग जंग-ए-उहुद में हलाक हुए,
सिवाय दो लोगों के — मुसअब बिन उमैर और सुवैत बिन हरमला (रज़ि.),
जिन्होंने इस्लाम क़बूल किया और इज़्ज़त पाए।
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