Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanus tajeeboo lillaahi wa lir Rasooli izaa da'aakum limaa yuhyeekum wa'lamooo annal laaha yahoolu bainal mar'i wa qalbihee wa anahooo ilaihi tuhsharoon)
रसूल ﷺ की पुकार हक़ीक़त में अल्लाह की पुकार है।
मोमिन का फ़र्ज़ है कि जब भी बुलाया जाए,
तो फ़ौरन हाज़िर हो, चाहे वह नमाज़ में हो।
यह नबी ﷺ की अज़मत और इत्तिबा का हुक्म है।
नबी ﷺ की दावत ऐसी है जो रूह को ज़िन्दगी देती है।
चाहे वह क़ुरआन, हदीस, ईमान या जिहाद की दावत हो।
यही असली हयात है, और इसे क़बूल करना हयात-ए-अबदी का ज़रिया है।
अल्लाह इंसान और उसके दिल के बीच हाइल हो जाता है।
वह चाहें तो नीयत बदल देता है या इंसान को अमल से रोक देता है।
इसलिए देर करने की बजाय हुक्म पर फ़ौरन अमल करना ज़रूरी है।
आख़िरकार सबको अल्लाह की तरफ़ लौटना है।
मौत अचानक भी आ सकती है और इरादे बीच में टूट सकते हैं।
इसलिए रसूल ﷺ की दावत को टालना जहालत और नुक़सान है।
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