Transliteration: (Wa law 'alimal laahu feehim khairal la asma'ahum; wa law asma'ahum latawallaw wa hum mu'ridoon)
इस आयत का मतलब यह है कि दिल में ईमान और भलाई का बीज हो,
तो अल्लाह इंसान को हक़ सुनने और मानने की तौफ़ीक़ देता है।
अगर दिल बिल्कुल ख़ाली और कड़वा हो,
तो हिदायत का असर नहीं होता।
ईमान पहले, फिर समझ और हिदायत मिलती है।
अगर ये काफ़िर ज़ाहिरी तौर पर सुन भी लेते,
तो भी हक़ को मानने का जज़्बा और नबी ﷺ से मोहब्बत उनके दिलों में नहीं थी।
इसलिए नतीजा यही होता कि वे अहंकार और जिद्द से मुँह फेर लेते।
यहाँ उन लोगों के लिए भी चेतावनी है,
जो हक़ सुनकर उसे दिल से क़बूल नहीं करते,
या इस्लाम क़बूल करने के बाद इर्तिदाद (वापसी) करते हैं।
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