कुरान - 8:23 सूरह अल-अन्फाल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

23
وَلَوۡ عَلِمَ ٱللَّهُ فِيهِمۡ خَيۡرٗا لَّأَسۡمَعَهُمۡۖ وَلَوۡ أَسۡمَعَهُمۡ لَتَوَلَّواْ وَّهُم مُّعۡرِضُونَ

Transliteration: (Wa law 'alimal laahu feehim khairal la asma'ahum; wa law asma'ahum latawallaw wa hum mu'ridoon)

और अगर अल्लाह उनमें कोई भलाई जानता, तो ज़रूर उन्हें सुनने की तौफ़ीक़ देता [47]।
और अगर उन्हें (ज़बरदस्ती) सुनने की क़ाबिलियत भी दे देता,
तो भी आख़िरकार वे मुँह मोड़ ही लेते [48]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अन्फाल आयत 23 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनफ़ाल – आयत 23 की तफ़्सीर

✅ [47] ईमान से पहले हिदायत नहीं

इस आयत का मतलब यह है कि दिल में ईमान और भलाई का बीज हो,
तो अल्लाह इंसान को हक़ सुनने और मानने की तौफ़ीक़ देता है।
अगर दिल बिल्कुल ख़ाली और कड़वा हो,
तो हिदायत का असर नहीं होता।
ईमान पहले, फिर समझ और हिदायत मिलती है।

✅ [48] सुनकर भी इन्कार करने वाले

अगर ये काफ़िर ज़ाहिरी तौर पर सुन भी लेते,
तो भी हक़ को मानने का जज़्बा और नबी ﷺ से मोहब्बत उनके दिलों में नहीं थी।
इसलिए नतीजा यही होता कि वे अहंकार और जिद्द से मुँह फेर लेते।
यहाँ उन लोगों के लिए भी चेतावनी है,
जो हक़ सुनकर उसे दिल से क़बूल नहीं करते,
या इस्लाम क़बूल करने के बाद इर्तिदाद (वापसी) करते हैं।

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