Transliteration: (Wa'lamooo annamaa ghanimtum min sha'in fa anna lillaahi khumusahoo wa lir Rasooli wa lizil qurba walyataamaa walmasaakeeni wabnis sabeeli in kuntum aamantum billaahi wa maaa anzalnaa 'ala 'abdinaa yawmal Furqaani yawmaltaqal jam'aan; wal laahu 'alaa kulli shai'in Qadeer)
काफ़िरों से जंग में हासिल माल को ग़नीमत कहा जाता है। इसमें से चार-पाँचवां हिस्सा मुजाहिदीन को दिया जाता है और एक-पाँचवां हिस्सा इस आयत में बताए गए हक़दारों के लिए रखा जाता है।
अल्लाह का हिस्सा अलग नहीं है, बल्कि रसूल ﷺ के हिस्से के साथ जुड़ा हुआ है, ताकि यह बरकत और रब्बानी ताईद को दर्शाए। रसूल ﷺ के जीवन में उनका हिस्सा सीधे उन्हें मिलता था।
रसूल ﷺ के जीवन में उनकी नस्ल (बनू हाशिम और बनू मुत्तलिब) को इस हिस्से में से दिया जाता था। बाद में केवल ग़रीब रिश्तेदारों को दिया जाना सही है, जैसा कि इमाम अबू हनीफ़ा रहिमहुल्लाह की राय है।
ग़नीमत का यह हिस्सा यतीमों और मिस्कीनों की मदद के लिए है। सिर्फ़ नस्ल या रिश्तेदारी नहीं, बल्कि हक़दारी और ज़रूरत असल पैमाना है।
अगर कोई अमीर भी हो लेकिन सफ़र में मजबूर और बेबस हो जाए, तो उसे भी इस हिस्से से दिया जा सकता है।
"अगर तुम ईमान रखते हो" का मतलब यह नहीं कि शक है, बल्कि यह आदेश की अहमियत को जताने के लिए है।
यह ग़ज़वा-ए-बद्र (17 रमज़ान, 2 हिजरी) का ज़िक्र है, जब हक़ और बातिल का फ़ैसला हो गया। अल्प संख्या के बावजूद मुसलमानों को अल्लाह की मदद से फ़तह मिली।
इस फ़तह और हुक्म से यह साबित हुआ कि असली मदद सिर्फ़ अल्लाह की तरफ़ से होती है। उसकी क़ुदरत हर चीज़ पर पूरी है।
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