Transliteration: (Iz antum bil'udwatid dunyaa wa hum bil'udwatil quswaa warrakbu asfala minkum; wa law tawaa'attum lakhtalaftum fil mee'aadi wa laakil liyaqdiyal laahu amran kaana maf'oolal liyahlika man halaka 'am baiyinatinw wa yahyaa man haiya 'am baiyinah; wa innal laaha la Samee'un 'Aleem)
यहाँ ग़ज़वा-ए-बद्र का पूरा जुग़राफ़ियाई मंज़र बताया जा रहा है। मुसलमान मदीना की तरफ़ घाटी के पास थे, क़ुरैश मक्का की तरफ़ वाली ढलान पर थे और अबू सुफ़यान का क़ाफ़िला समुद्र के किनारे से गुज़र रहा था, जो मुसलमानों से क़रीब तीन मील दूर था। यह सब अल्लाह की तरफ़ से तयशुदा इंतज़ाम था।
अगर दोनों जमाअतें पहले से तारीख़ और जगह तय कर लेतीं, तो कमज़ोर तादाद और सामान की कमी की वजह से मुसलमान शायद पीछे हट जाते। अल्लाह ने अचानक आमना-सामना करवा दिया ताकि इंसानी हिसाब-किताब बीच में न आए।
यह अचानक का टकराव इसलिए हुआ ताकि अल्लाह का वह हुक्म ज़ाहिर हो जाए जो पहले से लिखा हुआ था — यानी हक़ को ग़लबा मिले और बातिल को ज़लील शिकस्त।
इस जंग ने ईमान और कुफ़्र में साफ़ फ़र्क़ कर दिया। अब जो ईमान लाएगा, वो दलील और हक़ीक़त की बुनियाद पर लाएगा, और जो इंकार करेगा, वो भी साफ़ सबूत के बावजूद गुमराही में रहेगा। "ज़िंदा रहना" का मतलब है ईमान पर रहना और "हलाक होना" का मतलब है कुफ़्र पर मरना।
अल्लाह हर चीज़ को सुनता और जानता है। रसूल ﷺ ने बद्र के मैदान में अल्लाह से पूरी तल्लीनता से मदद माँगी, तो अल्लाह ने शानदार तरीक़े से उनकी दुआ क़ुबूल की और ईमान वालों को मदद बख़्शी।
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