Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanooo izaa laqeetum fi'atan fasbutoo wazkurul laaha kaseeral la'allakum tuflihoon)
मुसलमानों को ताकीद की गई कि जंग की ख्वाहिश न करो, लेकिन जब सामना हो तो पीठ न दिखाओ। दुश्मन की कुव्वत को हल्का समझना ग़लत है। असली कामयाबी साबित क़दमी, हिम्मत और अज़्म से शुरू होती है।
जंग के वक्त दिल को अल्लाह से जोड़े रखना और ज़िक्र करते रहना ईमान वालों को रूहानी ताक़त देता है। ज़ुबान से तस्बीह और दुआ, और हाथ में तलवार — दोनों साथ-साथ। यह ज़िक्र दिलों को मज़बूत करता है और इत्तेहाद (एकता) पैदा करता है।
इस आयत में जंग में असली कामयाबी की तीन शर्तें बताई गईं:
यहाँ तक कि जंग के हालात में भी नमाज़ को छोड़ा नहीं गया, बल्कि सलातुल-ख़ौफ़ (ख़ौफ़ की नमाज़) का हुक्म दिया गया, ताकि इबादत हर हाल में जारी रहे।
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