कुरान - 8:45 सूरह अल-अन्फाल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

45
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِذَا لَقِيتُمۡ فِئَةٗ فَٱثۡبُتُواْ وَٱذۡكُرُواْ ٱللَّهَ كَثِيرٗا لَّعَلَّكُمۡ تُفۡلِحُونَ

Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanooo izaa laqeetum fi'atan fasbutoo wazkurul laaha kaseeral la'allakum tuflihoon)

ऐ ईमान वालो! जब तुम किसी लश्कर (दुश्मन की फ़ौज) से आमना-सामना करो [102], तो डटे रहो, और अल्लाह को बहुत ज़िक्र करो [103], ताकि तुम कामयाबी पाओ [104]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अन्फाल आयत 45 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनफ़ाल – आयत 45 की तफ़्सीर

✅ [102] जंग में हिम्मत और हक़ीक़त-पसंदी

मुसलमानों को ताकीद की गई कि जंग की ख्वाहिश न करो, लेकिन जब सामना हो तो पीठ न दिखाओ। दुश्मन की कुव्वत को हल्का समझना ग़लत है। असली कामयाबी साबित क़दमी, हिम्मत और अज़्म से शुरू होती है।

✅ [103] मैदान-ए-जंग में अल्लाह का ज़िक्र

जंग के वक्त दिल को अल्लाह से जोड़े रखना और ज़िक्र करते रहना ईमान वालों को रूहानी ताक़त देता है। ज़ुबान से तस्बीह और दुआ, और हाथ में तलवार — दोनों साथ-साथ। यह ज़िक्र दिलों को मज़बूत करता है और इत्तेहाद (एकता) पैदा करता है।

✅ [104] कामयाबी की कुंजियाँ

इस आयत में जंग में असली कामयाबी की तीन शर्तें बताई गईं:

  1. साबित क़दम रहना – दुश्मन के सामने डटे रहना।
  2. अल्लाह का ज़िक्र – दिल को हर हाल में अल्लाह से वाबस्ता रखना।
  3. ख़लूस-ए-नीयत – मक़सद सिर्फ़ अल्लाह की रज़ामंदी हो, न कि माल-ओ-दौलत या ज़मीन।

यहाँ तक कि जंग के हालात में भी नमाज़ को छोड़ा नहीं गया, बल्कि सलातुल-ख़ौफ़ (ख़ौफ़ की नमाज़) का हुक्म दिया गया, ताकि इबादत हर हाल में जारी रहे।

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