कुरान - 8:46 सूरह अल-अन्फाल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

46
وَأَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ وَلَا تَنَٰزَعُواْ فَتَفۡشَلُواْ وَتَذۡهَبَ رِيحُكُمۡۖ وَٱصۡبِرُوٓاْۚ إِنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلصَّـٰبِرِينَ

Transliteration: (Wa atee'ul laaha wa Rasoolahoo wa laa tanaaza'oo fatafshaloo wa tazhaba reehukum wasbiroo; innal laaha ma'as saabireen)

और अल्लाह और उसके रसूल की फ़रमाबरदारी करो [105], और आपस में झगड़ा मत करो, वरना तुम्हारा हौसला टूट जाएगा और तुम्हारी ताक़त जाती रहेगी [106]। और सब्र करो, बेशक अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है [107]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अन्फाल आयत 46 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनफ़ाल – आयत 46 की तफ़्सीर

✅ [105] जिहाद में इख़लास – नफ़्स की जगह नहीं

यह आयत बताती है कि जिहाद इबादत है, न कि शोहरत या घमंड का ज़रिया। मक़सद सिर्फ़ अल्लाह के हुक्म की तामील और इस्लाम की हिफ़ाज़त हो। दुश्मनों के सामने हिम्मत से बोलना घमंड नहीं बल्कि शुजाअत (बहादुरी) है।

✅ [106] झगड़े हार और कमज़ोरी का सबब

यहाँ तीन अहम बातें बयान हुईं:

  1. आपसी झगड़े और तकरार उम्मत को कमज़ोर कर देते हैं।
  2. अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की इताअत ही इत्तेहाद (एकता) की दवा है।
  3. नाफ़रमानी और घमंड से अल्लाह की मदद रुक जाती है और दुश्मन पर रोब-ओ-दबदबा भी मिट जाता है।

✅ [107] सब्र – फ़तह की बुनियाद

जिहाद में सब्र को बुनियादी शर्त बताया गया। अल्लाह सब्र करने वालों के साथ होता है, उन्हें रूहानी मदद और नुसरत देता है। जंग के हालात में भी जमाअत की नमाज़ नहीं छोड़ी जाती, बल्कि सलातुल-ख़ौफ़ (ख़ौफ़ की नमाज़) का हुक्म है। जो शख़्स बेकार वजह से नमाज़ छोड़ दे, वह उनसे ज़्यादा गुनहगार है जो मैदान-ए-जंग में भी नमाज़ कायम रखते हैं।

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