Transliteration: (Wa atee'ul laaha wa Rasoolahoo wa laa tanaaza'oo fatafshaloo wa tazhaba reehukum wasbiroo; innal laaha ma'as saabireen)
यह आयत बताती है कि जिहाद इबादत है, न कि शोहरत या घमंड का ज़रिया। मक़सद सिर्फ़ अल्लाह के हुक्म की तामील और इस्लाम की हिफ़ाज़त हो। दुश्मनों के सामने हिम्मत से बोलना घमंड नहीं बल्कि शुजाअत (बहादुरी) है।
यहाँ तीन अहम बातें बयान हुईं:
जिहाद में सब्र को बुनियादी शर्त बताया गया। अल्लाह सब्र करने वालों के साथ होता है, उन्हें रूहानी मदद और नुसरत देता है। जंग के हालात में भी जमाअत की नमाज़ नहीं छोड़ी जाती, बल्कि सलातुल-ख़ौफ़ (ख़ौफ़ की नमाज़) का हुक्म है। जो शख़्स बेकार वजह से नमाज़ छोड़ दे, वह उनसे ज़्यादा गुनहगार है जो मैदान-ए-जंग में भी नमाज़ कायम रखते हैं।
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