Transliteration: (Wa iz zaiyana lahumush shaitaanu a'maalahum wa qaala laa ghaaliba lakumul yawma minan naasi wa innee jaarul lakum falammaa taraaa'atil fi'ataani nakasa 'alaa aqibaihi wa qaala innee bareee'um minkum innee araa maa laa tarawna inneee akhaaful laah; wallaahu shadeedul 'iqaab)
शैतान ने कुफ़्फ़ार के बुरे कामों को उनके नज़रों में अच्छा और जायज़ बना कर दिखाया। वह इंसानी शक्ल में (सुराक़ा बिन मालिक की शक्ल में) उनके पास आया और उनके मन्सूबों की तारीफ़ की, ताकि वे जंग पर उतर आएँ। इससे सबक़ मिलता है कि जो भी गुनाह की हिम्मत बंधाए, वह हक़ीक़त में शैतान है।
बदर के दिन शैतान ने बनो किनाना की तरफ़ से हिफ़ाज़त का वादा किया और कुफ़्फ़ार से कहा: “आज कोई तुम पर ग़ालिब नहीं आ सकता, मैं तुम्हारे साथ हूँ।” लेकिन जब उसने फ़रिश्तों के नुज़ूल (उतरने) को देखा तो भाग खड़ा हुआ। इससे हक़ीक़त सामने आई कि गुनाह के साथी मुसीबत की घड़ी में हमेशा छोड़ जाते हैं।
जब शैतान ने वह मंज़र देखा जो कुफ़्फ़ार नहीं देख पा रहे थे (यानी फ़रिश्तों की मदद), तो वह कायराना तरीक़े से भाग निकला और कह दिया: “मेरा तुमसे कोई ताल्लुक़ नहीं।” उसने उन्हें हलाक़त तक पहुँचा कर बीच रास्ते में छोड़ दिया। यही शैतान की आदत है कि मौक़े पर धोखा देकर किनारा कर लेता है।
शैतान ने कहा: “मैं अल्लाह से डरता हूँ।” इससे मालूम हुआ कि वह खुद भी अल्लाह की क़ुदरत को मानता है। मगर सिर्फ़ ख़ौफ़ और इकरार, बिना इताअत और बंदगी के, बे-फ़ायदा है। यही वजह है कि उसका डर भी उसे अल्लाह की सख़्त सज़ा से नहीं बचा सका।
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