Transliteration: (Kadaabi Aali Fir'awna wal lazeena min qablihim; kafaroo bi Aayaatil laahi fa akhazahu mul laahu bizunoobihim; innal laaha qawiyyun shadeedul 'iqaab)
इससे यह शिक्षा मिलती है कि अनुयायियों को भी परिवार कहा जाता है। फ़िरऔन, भले ही उसकी अपनी संतान न थी, लेकिन उसके पुलिस और सैनिकों की क्रूरता की वजह से उन्हें सामूहिक रूप से फ़िरऔन की क़ौम कहा गया। इसी अर्थ के आधार पर हज़रत मुहम्मद ﷺ के हर सहाबी और सच्चे अनुयायी को उनका रूहानी परिवार कहा जा सकता है।
अल्लाह ने उन लोगों को दुनिया में भी सज़ा दी और क़ब्र व आख़िरत में भी उन्हें अज़ाब दिया जाएगा। यह आयत हज़रत मुहम्मद ﷺ को तसल्ली देती है कि काफ़िरों की तक़ज़ीब (इन्कार) से दुखी न हों। ऐसा विरोध तो हमेशा से पैग़म्बरों के मिशन में होता आया है।
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