Transliteration: (Zaalika bi annal laaha lam yakumu ghaiyiran ni'matan an'amahaa 'alaa qawmin hattaa yughaiyiroo maa bianfusihim wa annallaaha samee'un 'Aleem)
अल्लाह ने मक्का के काफ़िरों को अमान (सुरक्षा), रिज़्क़ और इज़्ज़त दी थी। यहां तक कि उन्हें हज़रत मुहम्मद ﷺ जैसा सबसे बड़ी नेमत भी बख़्शी। लेकिन उन्होंने इसकी क़द्र न की, बल्कि शिर्क, ग़ुरूर और पैग़म्बर ﷺ से दुश्मनी में पड़ गए। नतीजा यह हुआ कि अल्लाह ने अपनी नेमतें उनसे वापस ले लीं। यह एक इलाही क़ानून है कि शुक्र अज़ाफ़ा लाता है और नाशुक्री नेमत छीन लेती है।
यह वही हक़ीक़त है जो सूरा अर-रअद (13:11) में भी बयान हुई है: “अल्लाह किसी क़ौम की हालत नहीं बदलता जब तक कि वे खुद अपने आप को न बदलें।”
यानी अल्लाह बिना वजह नेमतें वापस नहीं लेता, बल्कि जब लोग फ़रमाबरदारी छोड़कर ग़ुनाह चुन लेते हैं, तभी नेमतें उठ जाती हैं। अल्लाह की अता इंसान के कामों पर नहीं, बल्कि उसकी इलाही शान पर मुनहसिर है। जैसे हज़रत मरियम को बचपन से ही विलायत मिली और हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) को शुरू से ही इज़्ज़त और नबूवत दी गई। लेकिन जब क़ौमें खुद रुख़ मोड़ लेती हैं तो अल्लाह की नेमत भी उनसे दूर हो जाती है।
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