कुरान - 8:72 सूरह अल-अन्फाल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

72
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَهَاجَرُواْ وَجَٰهَدُواْ بِأَمۡوَٰلِهِمۡ وَأَنفُسِهِمۡ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ وَٱلَّذِينَ ءَاوَواْ وَّنَصَرُوٓاْ أُوْلَـٰٓئِكَ بَعۡضُهُمۡ أَوۡلِيَآءُ بَعۡضٖۚ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَلَمۡ يُهَاجِرُواْ مَا لَكُم مِّن وَلَٰيَتِهِم مِّن شَيۡءٍ حَتَّىٰ يُهَاجِرُواْۚ وَإِنِ ٱسۡتَنصَرُوكُمۡ فِي ٱلدِّينِ فَعَلَيۡكُمُ ٱلنَّصۡرُ إِلَّا عَلَىٰ قَوۡمِۭ بَيۡنَكُمۡ وَبَيۡنَهُم مِّيثَٰقٞۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعۡمَلُونَ بَصِيرٞ

Transliteration: (Innal lazeena aamanoo wa haajaroo wa jaahadoo bi amwaalihim wa anfusihim fee sabeelil laahi wallazeena aawaw wa nasarooo ulaaa'ika ba'duhum awliyaaa'u ba'd; wallazeena aamanoo wa lam yuhaajiroo maa lakum minw walaayatihim min shai'in hatta yuhaajiroo; wa inistan sarookum fid deeni fa'alaiku munnasru illaa 'alaa qawmin bainakum wa bainahum meesaaq; wallaahu bimaa ta'maloona Baseer)

निस्संदेह, जो लोग ईमान लाए और अल्लाह के लिए हिजरत की [161], और अपने माल और अपनी जान से अल्लाह के रास्ते में जिहाद किया, और जिन्होंने पनाह दी और मदद की — वही लोग एक-दूसरे के दोस्त और सहायक हैं। और जो लोग ईमान लाए, लेकिन हिजरत नहीं की, तो जब तक वे हिजरत न करें [162], तुम्हारे ऊपर उनकी हिफ़ाज़त की कोई ज़िम्मेदारी नहीं। और अगर वे तुमसे दीन के मामले में मदद माँगें, तो उनकी मदद करना तुम्हारे लिए फ़र्ज़ है, सिवाय उस क़ौम के मुक़ाबले जिनके साथ तुम्हारा समझौता है [163]। और अल्लाह देख रहा है जो कुछ तुम करते हो। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अन्फाल आयत 72 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनफ़ाल – आयत 72 की तफ़्सीर

✅ [161] हिजरत और जिहाद सिर्फ़ अल्लाह के लिए

इस आयत में यह हक़ीक़त बयान हुई कि असली हिजरत वही है जो सिर्फ़ अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के लिए की जाए, न कि दुनियावी या क़ौमी मफ़ाद के लिए। असली मुहाजिर वह है जो अपना घर-बार ईमान के लिए छोड़े, और असली मुजाहिद वह है जो अपने माल और जान से अल्लाह की राह में जिहाद करे, न कि ज़मीन या क़ौम के नाम पर।

✅ [162] वारिसत का हुक्म और हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी

शुरू में मुहाजिरीन और अंसार के बीच आपसी वारिसत का हक़ क़ायम कर दिया गया था, चाहे रिश्तेदारी न हो। इस वक़्त तक हिजरत न करने वाले रिश्तेदार वारिस नहीं बन सकते थे। बाद में यह हुक्म मंसूख कर दिया गया और अब वारिसत सिर्फ़ खून के रिश्तों पर क़ायम है (बशर्ते दीन अलग न हो)। इसी तरह हिजरत न करने वालों की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी भी तब तक नहीं जब तक वे हिजरत न कर लें।

✅ [163] मदद का असूल – दीन में हाँ, दुनिया में नहीं

इस आयत से तीन हुक्म निकले:

  • अगर कोई ईमान वाला जिसने हिजरत नहीं की, दीन के मामले में मदद माँगे, तो उसकी मदद करना फ़र्ज़ है।
  • यह मदद सिर्फ़ दीन की लड़ाई में होगी, दुनियावी या निजी झगड़ों में नहीं।
  • अगर दुश्मन किसी ऐसी क़ौम से हो जिनसे मुसलमानों का मुआहिदा (समझौता) हो, तो उसके ख़िलाफ़ मदद नहीं की जाएगी। इस तरह इस्लाम ने अमन और एहतियात की बेहतरीन मिसाल पेश की।

 

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