Transliteration: (Innal lazeena aamanoo wa haajaroo wa jaahadoo bi amwaalihim wa anfusihim fee sabeelil laahi wallazeena aawaw wa nasarooo ulaaa'ika ba'duhum awliyaaa'u ba'd; wallazeena aamanoo wa lam yuhaajiroo maa lakum minw walaayatihim min shai'in hatta yuhaajiroo; wa inistan sarookum fid deeni fa'alaiku munnasru illaa 'alaa qawmin bainakum wa bainahum meesaaq; wallaahu bimaa ta'maloona Baseer)
इस आयत में यह हक़ीक़त बयान हुई कि असली हिजरत वही है जो सिर्फ़ अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के लिए की जाए, न कि दुनियावी या क़ौमी मफ़ाद के लिए। असली मुहाजिर वह है जो अपना घर-बार ईमान के लिए छोड़े, और असली मुजाहिद वह है जो अपने माल और जान से अल्लाह की राह में जिहाद करे, न कि ज़मीन या क़ौम के नाम पर।
शुरू में मुहाजिरीन और अंसार के बीच आपसी वारिसत का हक़ क़ायम कर दिया गया था, चाहे रिश्तेदारी न हो। इस वक़्त तक हिजरत न करने वाले रिश्तेदार वारिस नहीं बन सकते थे। बाद में यह हुक्म मंसूख कर दिया गया और अब वारिसत सिर्फ़ खून के रिश्तों पर क़ायम है (बशर्ते दीन अलग न हो)। इसी तरह हिजरत न करने वालों की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी भी तब तक नहीं जब तक वे हिजरत न कर लें।
इस आयत से तीन हुक्म निकले:
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