कुरान - 7:105 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

105
حَقِيقٌ عَلَىٰٓ أَن لَّآ أَقُولَ عَلَى ٱللَّهِ إِلَّا ٱلۡحَقَّۚ قَدۡ جِئۡتُكُم بِبَيِّنَةٖ مِّن رَّبِّكُمۡ فَأَرۡسِلۡ مَعِيَ بَنِيٓ إِسۡرَـٰٓءِيلَ

Transliteration: (Haqeequn 'alaaa al laaa aqoola 'alal laahi illal haqq; qad ji'tukum bibaiyinatim mir Rabbikum fa arsil ma'iya Baneee Israaa'eel)

"मेरे लिए ये ज़रूरी है कि मैं अल्लाह के बारे में सिर्फ़ वही कहूँ जो हक़ है [242]। मैं तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से निशानियाँ लेकर आया हूँ। तो तू बनी इसराईल को मेरे साथ भेज दे" [243]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 105 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-आ'राफ़ – आयत 105 की तफ़्सीर

 

✅ [242] नुबूवत की बुनियाद — सच्चाई

इस आयत में मूसा अलैहिस्सलाम ने साफ़ किया कि कोई नबी अल्लाह के बारे में झूठ नहीं कह सकता। उसकी ड्यूटी सिर्फ़ हक़ बयान करना होती है, वही जो अल्लाह ने वह़ी के ज़रिये बताया हो। सच्चाई और नुबूवत का रिश्ता अटूट होता है—जैसे रौशनी और अंधेरा कभी एक नहीं हो सकते, वैसे ही रसूल का कहा हुआ झूठ नहीं हो सकता। नबी की हर बात अल्लाह की तरफ़ से आई हुई सच्चाई का आईना होती है।

✅ [243] बनी इसराईल की रिहाई की पुकार

मूसा अलैहिस्सलाम का मक़सद सिर्फ़ फ़िरऔन को ईमान की दावत देना ही नहीं था, बल्कि उन्होंने बनी इसराईल की आज़ादी की भी मांग की। वे एक रहनुमा और मुक्तिदाता बनकर आए थे, ताकि बनी इसराईल को सदियों की ग़ुलामी और ज़ुल्म से आज़ाद करें। यह फ़िरऔन की ज़ालिम हुकूमत के लिए सीधी चुनौती थी और इस्लाही मिशन का एक अहम मोड़।

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