Transliteration: (Haqeequn 'alaaa al laaa aqoola 'alal laahi illal haqq; qad ji'tukum bibaiyinatim mir Rabbikum fa arsil ma'iya Baneee Israaa'eel)
इस आयत में मूसा अलैहिस्सलाम ने साफ़ किया कि कोई नबी अल्लाह के बारे में झूठ नहीं कह सकता। उसकी ड्यूटी सिर्फ़ हक़ बयान करना होती है, वही जो अल्लाह ने वह़ी के ज़रिये बताया हो। सच्चाई और नुबूवत का रिश्ता अटूट होता है—जैसे रौशनी और अंधेरा कभी एक नहीं हो सकते, वैसे ही रसूल का कहा हुआ झूठ नहीं हो सकता। नबी की हर बात अल्लाह की तरफ़ से आई हुई सच्चाई का आईना होती है।
मूसा अलैहिस्सलाम का मक़सद सिर्फ़ फ़िरऔन को ईमान की दावत देना ही नहीं था, बल्कि उन्होंने बनी इसराईल की आज़ादी की भी मांग की। वे एक रहनुमा और मुक्तिदाता बनकर आए थे, ताकि बनी इसराईल को सदियों की ग़ुलामी और ज़ुल्म से आज़ाद करें। यह फ़िरऔन की ज़ालिम हुकूमत के लिए सीधी चुनौती थी और इस्लाही मिशन का एक अहम मोड़।
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