कुरान - 7:126 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

126
وَمَا تَنقِمُ مِنَّآ إِلَّآ أَنۡ ءَامَنَّا بِـَٔايَٰتِ رَبِّنَا لَمَّا جَآءَتۡنَاۚ رَبَّنَآ أَفۡرِغۡ عَلَيۡنَا صَبۡرٗا وَتَوَفَّنَا مُسۡلِمِينَ

Transliteration: (Wa maa tanqimu minnaaa illaaa an aamannaa bi Aayaati Rabbinaa lammaa jaaa'atnaa; Rabbanaaa afrigh 'alainaa sabranw wa tawaffanaa muslimeen)

यह कि तुम हमें किस बात का दोष देते हो, सिवाय इसके कि हमने अपने रब की आयतों पर ईमान ले लिया, जब वे हमारे पास आईं [260]। ऐ हमारे रब! हम पर सब्र उंडेल दे और हमें मुस्लिम की हालत में मौत दे [261]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 126 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-आराफ़ – आयत 126 की तफ़्सीर

✅ [260] काफ़िरों की नाराज़गी ईमान की पहचान

ईमान वाले जादूगरों ने फ़िरऔन से कहा कि उनका क्या गुनाह है, सिवाय इसके कि उन्होंने हक़ पर ईमान ले लिया। इससे यह हक़ीक़त सामने आती है कि काफ़िरों की नाराज़गी सच्चे ईमान की निशानी होती है। जो व्यक्ति ईमान वालों और काफ़िरों दोनों को राज़ी रखे, वह अक्सर मुनाफ़िक़ होता है।

✅ [261] नबियों की सोहबत की तासीर

उनकी दुआ से मालूम हुआ कि उन्होंने कितनी तरक़्क़ी हासिल कर ली — उन्होंने सब्र और मुस्लिम की मौत की दुआ मांगी। यह बताता है कि नबी की सोहबत का कितना गहरा असर होता है। जो लोग कभी जादूगर और गुमराह थे, वही हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की एक दिन की सोहबत से ईमान वाले, सहाबी और शहीद बन गए।

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