Transliteration: (Liyaghfira lakal laahu maa taqaddama min zanbika wa maa ta akhkhara wa yutimma ni'matahoo 'alaika wa yahdiyaka siraatan mustaqeema)
"ताकि अल्लाह आपके वसीले से आपके अगलों के और आपके पिछलों के गुनाह बख़्श दे [2] [3], और आप पर अपनी नेमत पूरी फ़रमा दे [4], और आपको सीधे रास्ते पर क़ायम रखे [5]!"
इस फ़तह (सुलह-ए-हुदैबिया व फ़तह-ए-मक्का) की बरकत से मक्का और अरब के हज़ारों लोग आपके ग़ुलाम और पैरोकार बने। हुज़ूर ﷺ के वसीले और इस्लाम की बरकत से अल्लाह ने उनके पिछले तमाम कुफ़्र व गुनाह माफ़ फ़रमा दिए। इस तरह यह सुलह उनके इस्लाम लाने का सबब बनी और इस्लाम उनकी मग़फ़िरत का ज़रिया बना।
अहले-सुन्नत वल-जमाअत का सर्वसम्मत अक़ीदा है कि तमाम अंबिया किराम मासूम होते हैं; हुज़ूर अकरम ﷺ की ज़ात-ए-मुबारक गुनाहों से पूरी तरह पाक है। यहाँ 'ज़म्ब' की निस्बत हुज़ूर ﷺ की तरफ़ तअ़ल्लुक़ और शफ़ाअत के एतबार से है।
जिस तरह किसी ख़ानदान का सरबराह अपने बच्चों या मातहतों के क़र्ज़ और ग़लती को अपनी कह कर अदा करता है, उसी तरह हुज़ूर ﷺ अपनी उम्मत के अगलों और पिछलों के गुनाहों की बख़्शिश के लिए बारगाह-ए-इलाही में शफ़ाअत फ़रमाते हैं, और अल्लाह ने अपने महबूब के सदक़े उम्मत के गुनाहों को माफ़ फ़रमा दिया।
इस अज़ीम फ़तह की बरकत से आपका दीन दुनिया के चारों कोनों में फैल गया, और अल्लाह ने आपको नुबुव्वत, रिसालत, महबूबियत, सरदारी और पूरी दुनिया की हुकूमत अता फ़रमाकर अपनी तमाम ज़ाहिरी व बातिनी नेमतों को कामिल फ़रमा दिया।
अल्लाह तआला ने अपने महबूब ﷺ को राजकाज, मुल्की इंतिज़ामिया, अदल व इंसाफ़ और रियासत की हुकमरानी के ऐसे आला उसूल सिखाए जो क़यामत तक की इंसानियत के लिए सीधा रास्ता (सिरात-ए-मुस्तक़ीम) हैं। अल्लाह जिन अंबिया को सल्तनत अता फ़रमाता है, उन्हें हुकूमत की रूहानी तरबियत भी ख़ुद सिखाता है।
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