कुरान - 48:22 सूरह अल-फत्ह अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

22
وَلَوۡ قَٰتَلَكُمُ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ لَوَلَّوُاْ ٱلۡأَدۡبَٰرَ ثُمَّ لَا يَجِدُونَ وَلِيّٗا وَلَا نَصِيرٗا

Transliteration: (Wa law qaatalakumul lazeena kafaroo la wallawul adbaara summa laa yajidoona waliyanw-wa laa naseeraa)

और अगर काफ़िर तुमसे जंग करते, तो वे ज़रूर पीठ फेरकर भाग जाते [63]! फिर वे न कोई हिमायती पाते और न कोई मददगार [64]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फत्ह आयत 22 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-फ़तह तफ़सीर - आयत 22

"और अगर काफ़िर तुमसे जंग करते, तो वे ज़रूर पीठ फेरकर भाग जाते [63]! फिर वे न कोई हिमायती पाते और न कोई मददगार [64]!"


[63] काफ़िरों की बुज़दिली और मुसलमानों का रोब

अगर मक्का के मुशरिकीन या ख़ैबर के यहूदी मुसलमानों से जंग की जुर्रत करते, तो अल्लाह की ग़ैबी नुसरत के सामने वे एक पल भी न टिक पाते और पीठ दिखाकर भाग खड़े होते। ख़ैबर में हज़रत अली मुर्तज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु की बहादुरी और मरहब का क़त्ल इस इलाही वादे का जीता-जागता सुबूत था (तफ़सीर रूहुल बयान)।


[64] हक़ीक़ी मदद सिर्फ़ अल्लाह की तरफ़ से है

काफ़िरों का कोई सच्चा मददगार नहीं था। जब ईमान वालों के दिल में इख़्लास हो, तो तादाद कम होने के बावजूद अल्लाह हमेशा हक़ वालों को ही फ़तह अता फ़रमाता है।

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