Transliteration: (Wa maaa arsalnaa qablaka minal mursaleena illaaa innahum la ya'kuloonat ta'aama wa yamshoona fil aswaaq; wa ja'alnaa ba'dakum liba'din fitnatan atasbiroon; wa kaana Rabbuka Baseera (section 2) (End Juz 18))
"और आपसे पहले जितने रसूल भेजे वे सब ऐसे ही थे [36]; खाना खाते थे और बाज़ारों में चलते थे [37]; और हमने बाज़ को बाज़ के लिए आज़माइश बनाया [38]; क्या तुम सब्र करोगे? और आपका रब ख़ूब देखने वाला है।"
काफ़िरों के इस एतराज़ का मुकम्मल जवाब दिया गया कि रसूल खाना क्यों खाता है। अल्लाह ने फ़रमाया कि हज़रत आदम से लेकर हज़रत ईसा अलैहिमुस्सलाम तक जितने भी रसूल हमने भेजे, वे सब के सब बशर थे, खाना खाते थे और अपनी ज़रूरतों के तहत ज़िन्दगी बसर करते थे। पस हुज़ूर ﷺ का खाना खाना नबुव्वत के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि तमाम अंबिया की मुश्तरका सुन्नत है।
पिछले तमाम पैग़म्बर भी अपनी ज़रूरतों के लिए बाज़ारों में तशरीफ़ ले जाते थे और वहीं लोगों को हक़ की दावत देते थे। रसूल का इंसानों के दरमियान रहना ही नबुव्वत का मक़सद पूरा करता है।
अल्लाह तआला ने दुनिया में अमीरों को ग़रीबों के ज़रिए और सेहतमंदों को बीमारों के ज़रिए आज़माया है। इसी तरह काफ़िरों और नाफ़रमानों की ईज़ा-रसानी पर अहले-ईमान को सब्र करने का हुक्म दिया गया है। अल्लाह तआला अपने नबी और मोमिनीन के हर सब्र और अहल-ए-बातिल की हर हरकत को ख़ूब देख रहा है और सबका पूरा-पूरा बदला देगा।
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