कुरान - 25:21 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

21
۞وَقَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَرۡجُونَ لِقَآءَنَا لَوۡلَآ أُنزِلَ عَلَيۡنَا ٱلۡمَلَـٰٓئِكَةُ أَوۡ نَرَىٰ رَبَّنَاۗ لَقَدِ ٱسۡتَكۡبَرُواْ فِيٓ أَنفُسِهِمۡ وَعَتَوۡ عُتُوّٗا كَبِيرٗا

Transliteration: (Wa qaalal lazeena laa yarjoona liqaaa'anaa law laaa unzila 'alainal malaaa'ikatu awnaraa Rabbanaa; laqadistakbaroo feee anfusihim wa 'ataw 'utuwwan kabeeraa)

और जो लोग हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते उन्होंने कहा [39], 'हम पर फ़रिश्ते क्यों नहीं उतारे गए [40], या हम अपने रब को (सामने) क्यों नहीं देखते [41]?' यक़ीनन उन्होंने अपने दिलों में बड़ा तकब्बुर किया और वे बहुत बड़ी सरकशी पर उतर आए [42]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 21 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 21

"और जो लोग हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते उन्होंने कहा [39], 'हम पर फ़रिश्ते क्यों न उतारे गए [40], या रब को क्यों नहीं देखते [41]?' यक़ीनन दिलों में बड़ा घमंड किया और हद से गुज़र गए [42]!"

[39] आख़िरत और मुलाक़ात-ए-इलाही का इंकार

यहाँ उन काफ़िरों का ज़िक्र है जो दोबारा ज़िन्दा होने और अल्लाह की बारगाह में हिसाब-किताब के लिए पेश होने का यक़ीन नहीं रखते। जब इंसान का दिल आख़िरत के ख़ौफ़ से ख़ाली हो जाता है, तो वह बेबाक होकर ऐसी गुस्ताख़ी भरी बातें करने लगता है।

[40] फ़रिश्तों के उतरने का मुतालबा

काफ़िरों ने कहा कि हमारे पास फ़रिश्ते क्यों नहीं आते जो हमसे कहें कि मुहम्मद ﷺ अल्लाह के सच्चे रसूल हैं और तुम उन पर ईमान लाओ। यह उनकी ज़िद और हठधर्मी थी, क्योंकि जब वे रसूलुल्लाह ﷺ के मोजिज़ात देखकर ईमान न लाए तो फ़रिश्तों को देखकर भी यही कहते कि यह जादू है।

[41] ख़ुदा-ए-ताला को अपनी आँखों से देखने का गुस्ताख़ाना मुतालबा

उन्होंने निहायत गुस्ताख़ी से कहा कि हम अपने रब को अपनी इन ज़ाहिरी आँखों से सामने क्यों नहीं देखते ताकि हमें यक़ीन आ जाए। अल्लाह तआला जिस्म और मक़ाम से पाक है, दुनिया की फानी आँखें उसका दीदार नहीं कर सकतीं। यह मुतालबा उनकी शदीद जहालत और तकब्बुर का नतीजा था।

[42] दिलों का तकब्बुर और अज़ीम सरकशी

अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि इन बदबख़्तों ने अपने आप को बहुत बड़ा समझ लिया और सरकशी की तमाम हदें पार कर दीं। अपनी औक़ात भूलकर ख़ुदा-ए-ज़ुलजलाल से ऐसे गुस्ताख़ाना सवाल करना उनके कुफ़्र और हलाकत का सबब बना।

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