Transliteration: (Wa Yawma ya'adduz zaalimu 'alaa yadaihi yaqoolu yaa laitanit takhaztu ma'ar Rasooli sabeelaa)
"और जिस दिन ज़ालिम अपने दोनों हाथ चबाएगा और कहेगा, 'हाय काश! मैंने रसूल के साथ रास्ता इख़्तियार किया होता [53]!'"
यह आयत उक़्बा बिन अबी मुईत के बारे में नाज़िल हुई, जो हुज़ूर ﷺ की मज्लिस में बैठता था और कलिमा पढ़ने के क़रीब था, लेकिन अपने काफ़िर दोस्त उबई बिन ख़लफ़ के बहकावे में आकर इस्लाम से फिर गया और हुज़ूर ﷺ की शान में गुस्ताख़ी कर बैठा। क़ियामत के दिन जब वह अज़ाब देखेगा तो शदीद हसरत व अफ़सोस से अपने दोनों हाथ कोहनी तक चबा जाएगा और रो-रोकर कहेगा: काश! मैंने रसूलुल्लाह ﷺ की पैरवी की होती और ईमान का रास्ता अपनाया होता।
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