कुरान - 25:27 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

27
وَيَوۡمَ يَعَضُّ ٱلظَّالِمُ عَلَىٰ يَدَيۡهِ يَقُولُ يَٰلَيۡتَنِي ٱتَّخَذۡتُ مَعَ ٱلرَّسُولِ سَبِيلٗا

Transliteration: (Wa Yawma ya'adduz zaalimu 'alaa yadaihi yaqoolu yaa laitanit takhaztu ma'ar Rasooli sabeelaa)

और जिस दिन ज़ालिम (अफ़सोस व हसरत से) अपने दोनों हाथ चबाएगा और कहेगा, 'हाय काश! मैंने रसूल के साथ (हिदायत का) रास्ता इख़्तियार किया होता [53]!' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 27 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 27

"और जिस दिन ज़ालिम अपने दोनों हाथ चबाएगा और कहेगा, 'हाय काश! मैंने रसूल के साथ रास्ता इख़्तियार किया होता [53]!'"

[53] उक़्बा बिन अबी मुईत का वाक़िया और ज़ालिमों की हसरत

यह आयत उक़्बा बिन अबी मुईत के बारे में नाज़िल हुई, जो हुज़ूर ﷺ की मज्लिस में बैठता था और कलिमा पढ़ने के क़रीब था, लेकिन अपने काफ़िर दोस्त उबई बिन ख़लफ़ के बहकावे में आकर इस्लाम से फिर गया और हुज़ूर ﷺ की शान में गुस्ताख़ी कर बैठा। क़ियामत के दिन जब वह अज़ाब देखेगा तो शदीद हसरत व अफ़सोस से अपने दोनों हाथ कोहनी तक चबा जाएगा और रो-रोकर कहेगा: काश! मैंने रसूलुल्लाह ﷺ की पैरवी की होती और ईमान का रास्ता अपनाया होता।

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