कुरान - 25:30 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

30
وَقَالَ ٱلرَّسُولُ يَٰرَبِّ إِنَّ قَوۡمِي ٱتَّخَذُواْ هَٰذَا ٱلۡقُرۡءَانَ مَهۡجُورٗا

Transliteration: (Wa qaalar Rasoolu yaa Rabbi inna qawmit takhazoo haazal Qur'aana mahjooraa)

और रसूल कहेंगे [56], 'ऐ मेरे रब! बेशक मेरी क़ौम ने इस क़ुरआन को बिल्कुल छोड़ रखा था (पीठ पीछे डाल दिया था) [57]!' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 30 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 30

"और रसूल कहेंगे [56], 'ऐ मेरे रब! बेशक मेरी क़ौम ने इस क़ुरआन को बिल्कुल छोड़ रखा था [57]!'"

[56] बारगाह-ए-इलाही में हुज़ूर ﷺ की शिकायत

क़ियामत के दिन हुज़ूर अक़दस ﷺ अपनी उम्मत के उन नाफ़रमानों और काफ़िरों की बारगाह-ए-ख़ुदावंदी में शिकायत फ़रमाएंगे जिन्होंने अल्लाह की अज़ीम किताब क़ुरआन-ए-मुक़द्दस की क़द्र न की। रसूलुल्लाह ﷺ की यह शिकायत मुनकिरीन के लिए सबसे बड़ी हलाकत होगी।

[57] क़ुरआन को 'महजूर' (तर्क) करने की सूरतें

क़ुरआन को छोड़ देने की कई सूरतें हैं: उस पर ईमान न लाना, उसकी तिलावत न करना, उसके अहकाम पर अमल न करना, उसके हलाल को हलाल और हराम को हराम न मानना, या उसकी तालीम छोड़कर दुनियावी बातिल क़वानीन को अपनाना। मुसलमानों को चाहिए कि क़ुरआन से अपना ताल्लुक़ मज़बूत रखें ताकि इस अज़ीम वईद से महफ़ूज़ रहें।

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