कुरान - 25:32 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

32
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ لَوۡلَا نُزِّلَ عَلَيۡهِ ٱلۡقُرۡءَانُ جُمۡلَةٗ وَٰحِدَةٗۚ كَذَٰلِكَ لِنُثَبِّتَ بِهِۦ فُؤَادَكَۖ وَرَتَّلۡنَٰهُ تَرۡتِيلٗا

Transliteration: (Wa qaalal lazeena kafaroo law laa nuzzila 'alaihil Qur'aanu jumlatanw waahidah; kazaalika linusabbita bihee fu'aadaka wa rattalnaahu tarteelaa)

और काफ़िरों ने कहा, 'इन पर पूरा क़ुरआन एक ही बार में क्यों नहीं उतार दिया गया [60]?' इसी तरह (हमने थोड़ा-थोड़ा उतारा) ताकि हम इसके ज़रिये आपके दिल को मज़बूत रखें [61], और हमने इसे ठहर-ठहर कर साफ़ तरीक़े से (तरतील के साथ) पढ़ सुनाया है [62]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 32 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 32

"और काफ़िरों ने कहा, 'इन पर पूरा क़ुरआन एक ही बार क्यों न उतारा गया [60]?' इसी तरह ताकि आपके दिल को मज़बूत रखें [61], और हमने इसे ठहर-ठहर कर सुनाया [62]!"

[60] यकमुश्त क़ुरआन नाज़िल न होने पर काफ़िरों का एतराज़

काफ़िरों ने एतराज़ किया कि जैसे तौरात, इंजील और ज़बूर अपने नबियों पर एक ही मर्तबा पूरी किताबें नाज़िल हुईं, वैसे क़ुरआन हुज़ूर ﷺ पर एक साथ क्यों नहीं उतरा, बल्कि 23 साल के अरसे में थोड़ा-थोड़ा क्यों नाज़िल हो रहा है?

[61] क़ल्ब-ए-मुस्तफ़ा ﷺ की तस्कीन और सबात

अल्लाह तआला ने हिकमत बयान फ़रमाई कि जब-जब काफ़िर ईज़ा पहुंचाते, कोई नया वाक़िया पेश आता या नया मसला उठता, तो हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम वह्य लेकर नाज़िल होते। बार-बार जिब्रील का आना और रब्बे-करीम का कलाम नाज़िल होना हुज़ूर ﷺ के मुक़द्दस दिल के लिए बेपनाह तस्कीन, सुरूर और कुव्वत का ज़रिया बनता था।

[62] 'तरतील' यानी ठहर-ठहर कर साफ़ नाज़िल फ़रमाना

क़ुरआन को थोड़ा-थोड़ा नाज़िल करने में यह हिकमत भी थी कि उम्मत के लिए इसे याद रखना, इसके मआनी को समझना और इसके अहकाम पर ब-तदरीज (आहिस्ता-आहिस्ता) अमल करना आसान हो जाए।

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